राजस्थान किसान आंदोलन भाग 1 : बिजोलिया और बेगू किसान आंदोलन

राजस्थान किसान आंदोलन

राजस्थान किसान आंदोलन के भाग 1 में बिजोलिया किसान आंदोलन और बेगू किसान आंदोलन के सम्पूर्ण तथ्यों से संबधित पॉइंट को बारीकी से समझाया गया है जो आपको राजस्थान इतिहास को समझने और Central and Rajasthan state government ( केंद्र और राज्य सरकार ) के द्वारा आयोजित होने वाली परीक्षाओ ( RAS, REET, Rajasthan Police, Patwari, Forest Guard, Forester, LDC, Banking, College and School lecturer, RSMSSB, Rajasthan High Court exams ) में अच्छे नंबर लाने में सहायक होंगे 

बिजोलिया किसान आंदोलन 

अंग्रेजी नियंत्रण से पूर्व  बिजोलिया की विशेष स्थिति थी यह क्षेत्र  मराठा आक्रमण का सर्वाधिक शिकार था जब भी मराठा मेवाड़ पर आक्रमण करते थे तो बिजोलिया ठिकाना पहला शिकार होता था बिजोलिया का शुद्ध नाम विजयावल्ली था बिजोलिया का क्षेत्रफल लगभग 100 वर्ग मील था बिजोलिया उदयपुर राज्य की अ श्रेणी की जागीर में से एक था बिजोलिया ठिकाने में आंदोलन का मुख्य मुद्दा भू राजस्व निर्धारण और संग्रह की पद्धति थी इस कार्य हेतु लाटा एवं कुँता पद्धति मुख्यतः प्रचलित थी बिजोलिया आंदोलन भारत वर्ष का प्रथम व्यापक और शक्तिशाली किसान आंदोलन था 1894 मेरा गोविंद दास की मृत्यु के उपरांत किशन सिह ठिकानेदार बना जिसने किसानों के प्रति नीति तथा जागीर के प्रबंधन में परिवर्तन किया

यह आन्दोलन  1897-1941 तक चला  इसे भारत का पहला अहिंसात्मक किसान आंदोलन माना जाता है यह राजस्थान का प्रथम संगठित किसान आंदोलन था बिजोलिया वर्तमान में भीलवाड़ा जिले में उसकी से इसे ऊपरमाल की जागीर गांव कहा जाता था इस जागीर का संस्थापक अशोक परमार था जो 1527 के खानवा युद्ध में राणा सांगा की ओर से लड़ने गया था 

बिजोलिया किसान आंदोलन की शुरुवात 

1897 में बिजोलिया के अधिकांश धाकड़ जाति के किसान गंगाराम धाकड़ की मृत्युभोज में  गिरधारीपुरा गांव  में इकट्ठे हुए थे इस आंदोलन के प्रणेता साधु सीताराम दास  से उन्होंने इस आंदोलन का नेतृत्व किया था यह आंदोलन धाकड़ किसानों द्वारा किया गया था इस आंदोलन की शुरुआत 1897 में गिरधरपुरा गांव में हुई थी जब किसानों के दो प्रतिनिधि नानजी पटेल और ठाकरी पटेल मेवाड़ महाराणा फतेह सिंह से मिलने उदयपुर गए थे

1903 मे बिजोलिया के ठाकुर कृष्ण सिंह/किशन सिंह की ने किसानों पर चँवरी नामक नया कर लगा दिया था इसके अंतर्गत किसानों को अपनी लड़की के विवाह पर 5रू (13 रुपए) ठिकाने में जमा करवाने पड़ते थे किसानों के लाग के विरोध से घबराकर राव किशन सिह ने चँवरी लाग माफ कर दिया इस विजय ने किसानों के भावी असहयोग अहिंसात्मक आंदोलन  की आधारशिला रखी

नये राव पृथ्वी सिंह ने 1906 में किसानों पर तलवार बंधाई (उत्तराधिकार शुल्क) और घुडपडी कर लगा दिया, पृथ्वी सिंह के समय मेवाड में 84 प्रकार की लागबाग लागत (लगान के अतिरिक्त शेष कर) प्रचलित था | पृथ्वी सिहं कामां (भरतपुर) से बिजोलिया आया था बिजोलिया का स्थाई निवासी नहीं था इसलिए उसका बिजोलिया के किसानो के साथ कोई लगाव नहीं था और इस कारण उसने किसानों के साथ निर्दयता पूर्वक व्यवहार किया और विभिन्न प्रकार के कर लगाए

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पृथ्वी सिंह की मृत्यु के बाद उसके पुत्र केसरसिह  के नाबालिक होने के कारण मेवाड़ सरकार ने ठिकाने पर मुरसमात (कोटऑफ वार्ड्स) कायम कर दी 1907 में प्रसिद्ध क्रांतिकारी  शचिंद्र सान्याल और रासबिहारी बोस  के संपर्क में आने के बाद भूपसिहं (विजयसिह पथिक) ने क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया

1913 बिजोलिया ठिकाने में अकाल पड़ा था साधु सीताराम दास, ब्रम्हा देव और फतहलाल चारण के नेतृत्व में 1000 किसान राव से मिलने उनके घर गए पर राव ने मिलने से मना कर दिया इस कारण किसानो ने  जागीर की भूमि पर हल नहीं चलाया बल्कि मेवाड़ की खालसा भूमि, ग्वालियर तथा बूंदी रियासत की भूमि किराए पर लेकर उस पर हल चलाया         

इस लाग बाग लागत का साधु सीताराम दास, फतेहकरण चारण व ब्रह्मदेव ने 2 साल तक विरोध किया और कोई कर नहीं दिया 1914 में सीतारामदास ने विजय सिंह पथिक को बिजोलिया आमंत्रित किया था 1914 में चित्तौड़ में विद्या प्रचारिणी सभा का अधिवेशन हुआ था इस सभा में विजय सिंह पथिक और हरिबाई किंकर भाग लेने आए थे

बिजोलिया में सूखा पड़ने के बावजूद भी प्रथम विश्व युद्ध के लिए किसानों से वारफण्ड का चंदा वसूला जा रहा था जिसके कारण किसानों में असंतोष भडका इसके इसलिए विजय सिंह पथिक ने इस आंदोलन का नेतृत्व (भाग) किया

बिजोलिया किसान आंदोलन में विजय सिंह पथिक का योगदान

विजय सिंह पथिक 1916 में इस आंदोलन से जुड़ गए थे विजय सिंह पथिक का वास्तविक नाम भूपसिंह था यह बुलंदशहर के निकट गुठावली के रहने वाले थे इन्हें  21 फरवरी 1915 को प्रस्तावित क्रांति में अजमेर क्षेत्र में क्रांति करने की जिम्मेदारी दी गई थी क्रांति का भंडाफोड़  होने के कारण भूपसिंह को गिरफ्तार कर टाडगढ़ (ब्यावर) के किले  में नजर बंद कर दिया गया था यहां से फरार होकर इन्होंने अपना नाम विजय सिह पथिक कर लिया

बिजोलिया आंदोलन को गति देने के लिए पथिक ने हरियाली अमावस्या के दिन 1917 में उपरमाल पञ्च बोर्ड की स्थापना की गई थी जिसका पहला सरपंच मन्ना पटेल को बनाया गया था कानपुर से प्रकाशित होने वाले प्रताप नामक समाचार पत्र के माध्यम से पथिक ने इस आंदोलन को देशभर में चर्चित कर दिया था महात्मा गांधी ने अपने निजी सचिव महादेव देसाई को किसानों की समस्या जाने के लिए बिजोलिया भेजा था 1919 कांग्रेस अधिवेशन में बिजोलिया आंदोलन का प्रस्ताव रखा गया था 1919 में कांग्रेस के अमृतसर अधिवेशन में बिजोलिया किसान आंदोलन संबंधित प्रस्ताव बी जी तिलक द्वारा रखा गया था किंतु महात्मा गांधी व मदन मोहन मालवीय के हस्तक्षेप के पश्चात यह प्रस्ताव वापस ले लिया गया

राजस्थान सेवा संघ

महाराणा फतेह सिंह ने 1919 में बिंदु लाल भट्टाचार्य की अध्यक्षता में एक आयोग मेवाड़ भेजा था जिसमें सीताराम दास और माणिक्य लाल वर्मा को रिहा करने की बात कही थी जिसने 1919 में वर्धा (महाराष्ट्र) में राजस्थान सेवा संघ की स्थापना की जिसे 1920 में अजमेर स्थानांतरित कर दिया गया था इसी संस्था ने इस आंदोलन का संचालन किया था राजस्थान सेवा संघ के नेतृत्व में 8 अक्टूबर 1921 को बिना कूंता किसानों ने फसल काट ली थी कांग्रेस नेताओं के हस्तक्षेप से  1922  ई.ए.जी.जी. होलेंड व किसानों के बीच समझौता हुआ जिसमें 84 में से 35 लाग माफ कर दिए

तृतीय चरण ( 1923 से 1941  तक )

1923 में पथिक को विलियम ट्रेच की रिपोर्ट पर गिरफ्तार किया गया था 1927 के बाद इस आंदोलन का नेतृत्व पथिक ने फुर्सारिया ग्वालियर के पास मध्य प्रदेश से किया था 1927 मैं जमुना लाल बजाज व हरिभाऊ उपाध्याय इस आंदोलन से जुड़े जनवरी 1927 में मेवाड़ के बंदोबस्त अधिकारी श्री ट्रेंस बिजोलिया आए थे

1927 से बिजोलिया किसान आंदोलन के मुख्य नेता माणिक्य लाल वर्मा  थे इस आंदोलन के समय माणिक्य लाल वर्मा जी द्वारा रचित  पंछीड़ा गीत गाया जाने लगा इस आंदोलन से हरिभाऊ उपाध्याय, रामनारायण चौधरी और जमुनालाल बजाज आदि जुड़े हुए थ 1931 मैं जमनालाल बजाज व मेवाड़ के प्रधानमंत्री सुखदेव प्रसाद के मध्य एक समझौता हुआ लेकिन यह समझौता सफल नहीं हुआ,

24 नवंबर 1931 को बिजोलिया के किसानों ने उमाजी का खेरा की सभा में एक प्रस्ताव पारित किया यदि उन की असिंचित भूमि उन्हें वापस  मिल जाती है तो वह मेवाड़ के प्रजामंडल के आंदोलन में भाग नहीं लेंगे इसलिए मेवाड़ सरकार ने किसानों को प्रजामंडल के आंदोलन से दूर रखने के लिए उनके समझौते को स्वीकार कर लिया पर अगले 2 वर्ष तक किसानो को कोई राहत नहीं दी गई

अक्षय तृतीया के दिन 1932 को प्रातः 6:00 बजे 4000 किसानों ने अपनी इस्तीफाशुदा जमीनों पर हल चलाना प्रारंभ किया राजस्थान सेवा संघ द्वारा प्रकाशित राजस्थान केसरी तथा नवीन राजस्थान जैसे समाचार पत्रों में  बिजोलिया किसान आंदोलन के समर्थन  में क्रांतिकारी लेख छपे थे

मेवाड़ के प्रधानमंत्री टी राघवाचारी जी के प्रयासों से 1941 में बिजोलिया किसान आंदोलन जय हिंद एवं वंदे मातरम के उद्घोष के साथ समाप्त हुआ 1941  में मेवाड़ के प्रधानमंत्री TV राघवाचार्य ने राजस्व विभाग के मंत्री डॉक्टर मोहन सिंह मेहता को बिजोलिया भेज पर किसानों की मांगे मान  कर उंहें जमीन वापस कर दी गई और इस आंदोलन को खत्म किया गया

बिजोलिया आंदोलन को तीन चरणों में विभाजित किया गया था 

  • प्रथम चरण (1897 से 1915 तक) – रावकृष्ण सिंह चँवरी कर 1913 में बिजोलिया ठीकाने में  अकाल पड़ा था
  • द्वितीय चरण (1916 से 1922 तक) – विजय सिंह  बिजोलिया के द्वितीय चरण में बारीसल गांव में  किसान पंचायत बोर्ड की स्थापना की गई पथिक
  • तृतीय चरण ( 1923 से 1941  तक ) – माणिक्य लाल वर्मा और रामनारायण चौधरी बिजोलिया आंदोलन के तृतीय चरण में माणिक्य लाल वर्मा द्वारा 1938 में मेवाड में प्रजामंडल की स्थापना की गई थी

    बेगू किसान आंदोलन  

    बेगूँ आंदोलन बिजोलिया किसान आंदोलन की देन है बिजोलिया किसान आंदोलन से प्रोत्साहित होकर बेगू के किसानों  ने भी अत्याधिक  लाग, बाग, बैठ, बेगार एवं लगान के विरोध में आंदोलन करने का निर्णय लिया

    बेगूँ किसान आंदोलन की शुरुआत

    1921 में मेनाल (भीलवाडा) के भेरु कुंड नामक स्थान से हुई थी इस आंदोलन का नेतृत्व श्री रामनारायण चौधरी ने किया था  बेगू भी मेवाड़ रियासत का प्रथम श्रेणी का ठिकाना था वर्तमान में बेगू चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित है बेगू किसानों ने अपने जागीरदार के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया था ठाकुर अनूप सिंह के द्वारा लगान में वृद्धि किए जाने के विरोध में आंदोलन किया गया था बेगू आंदोलन की धाकड़ जाति के किसानों  द्वारा किया गया था किसानों ने श्री रामनारायण चौधरी के नेतृत्व में निर्णय किया कि फसल का कूँता नहीं कराया जाएगा सरकारी कार्यालयों और अदालतो का बहिष्कार किया जाएगा

    मई 1921  में बेगूँ ठीकाने के कर्मचारियों ने चांदखेड़ी नामक स्थान पर सभा में किसानों पर अमानुषिक व्यवहार किया 2 वर्षों के संघर्ष के बाद 1923 में बेगू के किसानों और ठाकुर अनूप सिंह  के मध्य समझोता हो गय मेवाड़ के महाराजा ने इस समझौते को बोल्शेविक की संज्ञा दी  बोल्शेविक एक रूसी शब्द है इसका अर्थ बहुमत होता है

    ट्रेंच आयोग का गठन

    इस आंदोलन के लिए ट्रेंच आयोग का गठन किया गया था लेकिन ट्रेंच आयोग ने बिना जांच के ही रिपोर्ट पेश कर दी थी इस ट्रेच आयोग का (जांच का) किसानो ने  बहिष्कार  किया 1923 में पारसोली (भीलवाड़ा)  नामक गांव में ठाकुर अनूप सिंह मैं किसानों की मांगों को स्वीकार कर लिया था  13 जुलाई 1923  में किसानों ने स्थिति की पूर्नसमीक्षा के लिए गोविंदपुरा गांव  में एक आम सभा का आयोजन किया गया इस अहिंसक आम सभा पर  13 July 1923 ट्रेंच  के आदेशानुसार लाठी चार्ज कर गोलियां चलाई गई इस गोलीबारी में रूपा जी व कृपा जी नामक दो किसान शहीद हुए इस अमानवीय कृत्य की निंदा राष्ट्रीय स्तर तक हुई इस घटना के बाद इस आंदोलन का नेतृत्व विजय सिंह पथिक जी ने स्वयं संभाला

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    बेगू किसान आंदोलन समाप्त करने के कारण

    आंदोलन के कारण बन रहे दबाव के फलस्वरुप बंदोबस्त व्यवस्था लागू करके lagaan की दरें कम की गई और अधिकांश लागें वापस ली गई व बेगार प्रथा को समाप्त किया गया विजय सिंह पथिक जी को 10 सितंबर 1923 को गिरफ्तार किया गया साढे 3 वर्ष के कारावास और 15000 के आर्थिक जुर्माने से दंडित किया गया पथिक जी की गिरफ्तारी के बाद ही आंदोलन समाप्त हो गया

    बेगू किसान आंदोलन को दबा दिया गया लेकिन इस आंदोलन से किसानों व जनता में राष्ट्रीय चेतना की दृष्टि से और अधिक जाग्रति  है किसानों ने  विजय सिह पथिक को आंदोलन का नेतृत्व  करने के लिए आमंत्रित किया था  पथिक जी द्वारा  राजस्थान सेवा संघ के मंत्री राम नारायण चौधरी को बेगू आंदोलन का नेतृत्व सौंपा गया था  बेगूँ आन्दोलन जैसा अत्याचार धंगडमउ  भंडावरी  में भी हुआ था मेवाड रियासत के पारसोली काछोला गॉव  में भी किसानों ने  भ्रष्टाचार के विरोध आंदोलन किया था

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