वैदिक सूक्ति-सुधा

1) बहुप्रजा निऋर्तिमा विवेश ।।-(ऋ०१/१६४/३२)
बहुत सन्तान वाले बहुत कष्ट पाते हैं।
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(2) मा ते रिषन्नुपसत्तारो अग्ने ।।-(अथर्व० २/६/२)
प्रभो ! आपके उपासक दुःखित न हों।
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(3)कस्तमिन्द्र त्वावसुमा मतर्यों दधर्षति ।। (ऋ०७/३२/१४)
ईश्वर भक्त का तिरस्कार कोई नहीं कर सकता।
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(4) मा त्वा वोचन्नत्रराधसं जनासः ।।-(अथर्व० ५/११/७)
लोग मुझे कंजूस न कहें।
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(5) इमं नः श्रृणवद्धवम् ।।-(ऋ०१०/२६/९)
वह प्रभु हमारी प्रार्थना को सुने।
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(6) स्तोतुर्मघवन्काममा पृण ।।-(ऋ० १/५७/५)
भगवान् ! भक्त की कामनाओं को पूर्ण करो।
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(7) ओ३म् खं ब्रह्म ।।-(यजु० ४०/१७)
ओ३म् परमात्मा सर्वव्यापक है।
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(8) विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि।।-(ऋ०२/२३/२)
सम्पूर्ण विद्याओं का आदि मूल तू ही है।
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(9) देवो देवानामसि ।।-(ऋ० १/९४/१३)
तू देवों का देव है।
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(10) यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति ।।-(अथर्व० ९/१०/१८)
जो उस प्रभु को नहीं जानता वह वेद से ही क्या फल प्राप्त करेगा।
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(11) स नः पर्षदति द्विषः ।।-(ऋ० १०/१८७/५)
वह परमात्मा हमें सब कष्टों से पार करे।
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(12) आरे बाधस्व दुच्छुनाम् ।।-(यजु० १९/३८)
दुष्ट पुरुषों को दूर भगाओ।
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(13) मा नः प्रजां रीरिषः ।।-(ऋ० १०/१८/१)
हे ईश्वर ! तू हमारी सन्तान का नाश न कर।
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(14) सत्या मनसो मे अस्तु ।।-( ऋ० १०/१२८/४)
मेरे मन की भावनाएं सच्ची हों।
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(15) लोकं कृणोतु साधुया ।।-(यजु० २३/४३)
जनता को सच्चरित्र बनावें।
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(16) तनूपाऽ अग्न्रिः पातु दुरितादलद्यात् ।।-( यजु० ४/१५)
ईश्वर हमें निन्दनीय दुराचरण से बचावे।
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(17) दस्यूनव धूनुष्व ।।-(अथर्व० १९/४६/२)
दस्युओं को धुन डाल।
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(18) आ वीरोऽत्र जायताम् ।।-(अथर्व० ३/२३/२)
वीर सन्तान उत्पन्न कर।
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(19) भियं दधाना ह्रदयेषु शत्रुनः ।।-(ऋ० १०/८४/७)
शत्रु के ह्रदय में भय उत्पन्न कर दो।
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(20) सखा सखिभ्यो वरीयः कृणोतु ।।-(अथर्व० ७/५१/१)
मित्र को मित्र की भलाई करनी चाहिये।
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(21) दूर ऊनेन हीयते ।।-(अथर्व० १०/८/१५)
बुरी संगत से मनुष्य अवनत होता है।
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(22) गोस्तु मात्रा न विद्यते ।।-(यजु० २३/४८)
गौ का मूल्य नहीं है।
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(23) निन्दितारो निन्द्यासो भवन्तु ।।-(ऋ० ५/२/६)
निन्दक सबसे निन्दित होते हैं।
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(24) विश्वम्भर विश्वेन मा भरसा पाहि ।।-(अथर्व० २/१६/५)
प्रभो ! अपनी शक्ति से मेरी रक्षा करो।
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(25) न त्वदन्यो मघवन्नस्ति मर्डिता ।।-(ऋ० १/८४/१९)
हे ईश्वर !तुम्हारे सिवाय सुख देने वाला दूसरा कोई नहीं है।
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(26) आर्य ज्योतिरग्राः ।।-(ऋ० ७/३३/७)
आर्य प्रकाश (ज्ञान) को प्राप्त करने वाला होता है।
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(27) करो यत्र वरिवो बाधिताय ।।-( ऋ० ६/१८/१४)
पीड़ितों की सहायता करने वाले हाथ ही उत्तम हैं।
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(28) प्राता रत्नं प्रातरिश्वा दधाति ।।-(ऋ० १/१२५/१)
प्रातः जागने वाला प्रभात बेला में ऐश्वर्य पाता है।
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(29) मिथो विघ्नाना उपयन्तु मृत्युम् ।।-(अथर्व० ६/३२/३)
परस्पर लड़ने वाले मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।
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(30) अधः पश्यस्व मोपरि ।।-(ऋ० ८/३३/१९)
हे नारि ! नीचे देख ऊपर मत देख ।
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(31) मा दुरेवा उत्तरं सुम्नमुन्नशन् ।।-(ऋ २/२३/८)
दुराचारी उत्तम सुख को मत प्राप्त करें।
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(32) प्रमृणीहि शत्रून् ।।-(यजु०१३/१३)
शत्रुओं को कुचल डालो।
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(33) परि माग्ने दुश्चरिताद् बाधस्व ।।-(यजु० ४/२८)
हे ईश्वर ! आप मुझे दुष्ट आचरण से हटायें।
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(34) शन्नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे ।।-(यजु० ३६/८)
प्रभु हमारे दोपाये मनुष्यों और चौपाये पशुओं के लिए कल्याणकारी और सुखदायी हो।
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(35) ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति ।।-(अथर्व० ११/५/१७)
ब्रह्मचर्य रुपी तप के द्वारा राजा राष्ट्र का संरक्षण करता है।
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(36) मा पुरा जरसो मृथाः ।।-(अथर्व० ५/३०/१७)
हे मनुष्य ! तू बुढ़ापे से पहले मत मर।
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(37) सहोऽसि सहो मयि धेहि ।।-(यजु० १९/९)
हे प्रभो ! आप सहनशील हैं मुझमें सहनशीलता धारण करिये।