Abdul Ghaffar Khan

अब्दुल गफ्फार खान

अब्दुल गफ्फार खान को सरहदी गांधी, सीमांत गांधी, बादशाह खान, बच्चा खां आदि नामों से जाना जाता है।

एकनाथ ईश्वरन ने गफ्फार खान की जीवनी “Nonviolent Soldier of Islam” में लिखते हैं कि भारत में दो गांधी थे एक मोहनदास करमचंद गांधी और दूसरे खान अब्दुल गफ्फार खान।

अब्दुल गफ्फार खान का जन्म पाकिस्तान के पेशावर में हुआ था गफ्फार खान बचपन से ही होनहार बिरवान रहे, अफगानी लोग उन्हें बच्चा खान कहकर बुलाते थे।

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स्वतंत्रता के दिनों में इन्होंने संयुक्त स्वतंत्र और धर्मनिरपेक्ष भारत बनाने के लिए सन् 1920 में “खुदाई खिदमतगार” संगठन बनाया। इन्होंने कांग्रेस के समर्थन से भारत के पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत में ऐतिहासिक “लाल कुर्ती आंदोलन” चलाया।

गांधीजी के कट्टर अनुयायी होने के कारण इन्हें “सीमांत गांधी” भी कहा जाता है। स्वतंत्रता आंदोलन करते हुए इन्होंने कई बार कठोर जेल यात्राओं का शिकार होना पड़ा। इन्होंने जेल में ही सिक्ख गुरुग्रंथ एवं गीता का अध्ययन किया। सांप्रदायिक सौहार्द के लिए गुजरात की जेल में इन्होंने संस्कृत के विद्वानों और मौलवियों से गीता और कुरान की कक्षाएं लगवाई।

अंग्रेजों ने जब 1919 में पेशावर में मार्शल लगाया तो खान ने उनके सामने शांति प्रस्ताव रखा बदले में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। सन् 1930 में गांधी-इरविन समझौता के बाद ही अब्दुल खान को जेल से मुक्त किया गया।

1937 के प्रांतीय चुनाव में कांग्रेस ने सीमांत प्रांत की प्रांतीय विधान सभा में बहुमत प्राप्त किया तो खान मुख्यमंत्री बने। उसके बाद सन् 1942 में फिर से गिरफ्तार कर लिए गए। अंग्रेजों से मुल्क आजाद होने के बाद ही उन्हें जेल से आजादी मिली। देश के बंटवारे तक खान के संगठन खुदाई खिदमतगार ने कांग्रेस का साथ निभाया।

हिंदुस्तान के बंटवारे के मुखर विरोधी रहे। अंग्रेजों से देश आजाद हो जाने बाद भी सरहदी गांधी ने पाकिस्तान में रहकर पख्तून अल्पसंख्यकों हितों की लड़ाई छेड़ दी। 1978 पाकिस्तान सरकार ने जेल में डाल दिया। इन्होंने अपना निवास क्षेत्र पाकिस्तान से बदलकर अफ़गानिस्तान करना पड़ा। हमेशा ही भारत से अटूट मानसिक रूप से जुड़े रहे। इन्होंने 70 के दशक में पूरे भारत का भ्रमण किया।

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1985 के कांग्रेस शताब्दी समारोह में भी यह शामिल हुए। इनका संस्मरण ग्रंथ “My life and struggle” 1969 में प्रकाशित हुआ।

खान अब्दुल गफ्फार खान को वर्ष 1987 में भारत सरकार की ओर से भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

सन 1988 में पाकिस्तान सरकार ने इन्हें पेशावर में उनके घर में नजर बंद कर दिया। 20 जनवरी 1988 को इनकी मृत्यु हो गई।

 

Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

दिनेश मीना झालरा, टोंक

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