

यदि आप UPSC (IAS) या RPSC (RAS) मुख्य परीक्षा के गंभीर अभ्यर्थी हैं, तो पाठ्यक्रम का सबसे अमूर्त और वैचारिक खंड "प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के धार्मिक आंदोलन और धर्म दर्शन" (Religious Movements and Philosophies) है। इस खंड से प्रतिवर्ष मुख्य परीक्षा में विश्लेषणात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं, जहाँ सामान्य उत्तरों के स्थान पर दार्शनिक स्पष्टता (Philosophical Clarity) और सटीक उत्तर-लेखन शैली ही आपको अन्यों से बढ़त दिलाती है। यह विशेष ब्लॉग पोस्ट आपको परीक्षा के नवीन पैटर्न के अनुसार लघूतरात्मक (50-60 शब्द) एवं निबन्धात्मक (100-150 शब्द) श्रेणियों में आदर्श उत्तर फ्रेमिंग प्रदान करेगी। यदि आप मुख्य परीक्षा में उच्च अंक प्राप्त करना चाहते हैं, तो उत्तर-लेखन की इस मानक शैली को समझने और अपने अंकों को बूस्ट करने के लिए इस पोस्ट को अंत तक अवश्य पढ़ें!
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उत्तर: बोधिसत्व बौद्ध दर्शन (विशेषकर महायान) की वह केंद्रीय संकल्पना है, जो बुद्धत्व प्राप्त करने के पूर्व बुद्ध के विभिन्न जन्मों को दर्शाती है। यह ऐसे करुणाशील स्वरूप का प्रतीक है जो समस्त संसार के कल्याण और मुक्ति के लिए कार्य करता है तथा जन-कल्याण हेतु स्वेच्छा से स्वयं के निर्वाण (जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति) को स्थगित कर देता है।
उत्तर: वैदिक कर्मकांड परंपरा में 'सोम रस' की आहुति से जुड़े सोम यज्ञ अत्यंत महत्वपूर्ण थे। इनमें प्रमुख रूप से निम्नलिखित चार सोम यज्ञों का उल्लेख मिलता है:
उत्तर: 788 ई. में केरल के कलाडी में जन्मे आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्म के पुनरुत्थान में युगांतकारी भूमिका निभाई। उन्होंने वेदांत दर्शन के अंतर्गत 'अद्वैतवाद' (जीव और ब्रह्म की अभिन्नता) मत का प्रतिपादन किया। सांस्कृतिक एकता हेतु उन्होंने भारत के चार कोनों में चार पीठ स्थापित किए: उत्तर में केदारनाथ (ज्योतिर्मठ), दक्षिण में श्रृंगेरी, पूर्व में जगन्नाथ पुरी (गोवर्धन) और पश्चिम में द्वारिका (शारदामठ)।
उत्तर: सत्तारी सिलसिला भारत में सूफी मत की एक प्रमुख रहस्यवादी शाखा थी। इसकी स्थापना लोदी राजवंश के शासनकाल में 1485 ई. के दौरान सैयद अब्दुल्लाह सत्तारी द्वारा की गई थी। इस सिलसिले का मूल दृष्टिकोण अत्यंत तात्कालिक और गहन था; सैयद अब्दुल्लाह के अनुसार, "जो भी साधक ईश्वर को प्राप्त करना चाहता है, वह मेरे पास आए, मैं उसे साक्षात ईश्वर तक पहुँचा दूँगा।"
उत्तर: मध्यकाल (6वीं से 9वीं शताब्दी) में तमिल क्षेत्र में भक्ति आंदोलन का सूत्रपात करने वाले 12 वैष्णव संत 'अलवार' कहलाए। अलवार का शाब्दिक अर्थ है 'ईश्वर की भक्ति में डूबा हुआ'। इन संतों में प्रसिद्ध महिला संत अंडाल भी शामिल थीं। इनके द्वारा रचित भावपूर्ण भजनों का संकलन 'नित्य दिव्य प्रबंधम' नामक अत्यंत आदरणीय तमिल ग्रंथ में किया गया है।
उत्तर: सूफी और भक्ति संतों के मध्य अद्भुत वैचारिक साम्यता थी:
उत्तर: अष्टांगिक मार्ग दुख निरोध का व्यावहारिक साधन है, जिसे तीन मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है: प्रज्ञा (सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प), शील (सम्यक वाक, सम्यक कर्मान्त, सम्यक आजीव), और समाधि (सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि)। यह मध्यम मार्ग का अनुसरण करते हुए व्यक्ति को नैतिक जीवन जीने और मोक्ष (निर्वाण) प्राप्त करने की दिशा दिखाता है।
उत्तर संकेत: स्याद्वाद जैन दर्शन का ज्ञानमीमांसा का सिद्धांत है, जिसके अनुसार किसी भी वस्तु या सत्य के अनेक पहलू (अनेकांतवाद) होते हैं। मानव का ज्ञान सीमित और सापेक्ष होता है, इसलिए किसी भी निर्णय के आगे 'स्यात' (शायद/किसी अपेक्षा से) लगाना जरूरी है। यह सिद्धांत वैचारिक सहिष्णुता और दूसरों के विचारों के सम्मान पर बल देता है।
उत्तर: सूफ़ी आंदोलन का उदय रूढ़िवादी इस्लामिक कट्टरता के विरोध, सांसारिक विलासिता के त्याग और ईश्वर के प्रति प्रेम-भक्ति पर आधारित था। हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक संपर्क, स्थानीय लोक भाषाओं का प्रयोग, और खानकाहों (सूफ़ी संतों के निवास स्थान) द्वारा सामाजिक समरसता व समानता का संदेश देने के कारण यह आंदोलन आम जनता में तेजी से लोकप्रिय हुआ।
उत्तर: 6वीं से 9वीं शताब्दी के बीच दक्षिण भारत (तमिलनाडु) में अलवार (विष्णु भक्त) और नयनार (शिव भक्त) संतों ने भक्ति का प्रसार किया। उन्होंने जाति व्यवस्था का विरोध किया, महिलाओं को आंदोलन में शामिल किया और स्थानीय तमिल भाषा में भजनों (जैसे दिव्य प्रबंधम) की रचना की। उन्होंने धर्म को कर्मकांडों से निकालकर व्यक्तिगत प्रेम और समर्पण का मार्ग बनाया।
उत्तर: आदि शंकराचार्य का अद्वैत दर्शन 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः' पर आधारित है। इसके अनुसार केवल ब्रह्म ही एकमात्र परम सत्य है, और यह दृश्य जगत माया (अज्ञान) के कारण सत्य प्रतीत होता है। आत्मा और ब्रह्म दो अलग सत्ताएँ नहीं बल्कि एक ही हैं। ज्ञान मार्ग के द्वारा इस अज्ञान को मिटाकर मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।
उत्तर: चतुर्थ बौद्ध संगीति में बौद्ध धर्म वैचारिक मतभेदों के कारण हीनयान और महायान में विभाजित हो गया, जिनके दार्शनिक अंतर निम्नलिखित हैं:
संक्षेप में, हीनयान जहाँ अपरिवर्तनशील और व्यक्तिवादी है, वहीं महायान लोक-कल्याणकारी और समयानुकूल परिवर्तनशील है।
उत्तर: सनातन परंपरा में वेदों की प्रमाणिकता को स्वीकार करने वाले छह आस्तिक दार्शनिक संप्रदायों को 'षड्दर्शन' कहा जाता है, जो मानव जीवन के अंतिम लक्ष्य (मोक्ष) को परिभाषित करते हैं:
उत्तर: भक्ति के वैचारिक स्रोत: भक्ति की आद्य-ऐतिहासिक जड़ें सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों में मिलती हैं, जो वैदिक काल और विशेषकर 'श्रीमद्भगवद्गीता' में ज्ञान, कर्म व भक्ति के त्रिमार्ग के रूप में स्थापित हुईं। बौद्ध धर्म ने वैदिक प्रभुत्व के विरुद्ध नैतिक आचरण को केंद्र में रखा। मध्यकाल में आदि शंकराचार्य ने ज्ञान मार्ग से इसका दार्शनिक प्रतिपादन किया, जिसे आगे चलकर रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य आदि ने सगुण भक्ति तथा कबीर-नानक ने निर्गुण एकेश्वरवाद की ओर मोड़ा। इस्लाम के आगमन के बाद सांस्कृतिक संरक्षण की आवश्यकता ने इसे एक आंदोलन का रूप दिया।
भारतीय समाज पर प्रभाव:
उत्तर संकेत: भक्ति आंदोलन ने धार्मिक क्षेत्र के साथ-साथ गहरे सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव किए:
उत्तर संकेत: इस काल में नए धार्मिक आंदोलनों के उदय के पीछे निम्नलिखित परिस्थितियाँ थीं:
प्रश्न 17. मध्यकालीन भारत में सूफ़ी संतों की चिश्ती और सुहरावर्दी परंपराओं (सिलसिलों) के दृष्टिकोण और कार्यप्रणाली की तुलना कीजिए।
उत्तर संकेत: चिश्ती और सुहरावर्दी दोनों ही भारत के प्रमुख सूफ़ी सिलसिले थे, लेकिन उनकी कार्यप्रणाली में स्पष्ट अंतर था:
राज्याश्रय और धन: चिश्ती संत (जैसे ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती) राजकीय संरक्षण और धन-दौलत से दूर रहते थे। वे गरीबी और सादगीपूर्ण जीवन (फ़क्र) को प्राथमिकता देते थे। इसके विपरीत, सुहरावर्दी संत (जैसे बहाउद्दीन जकारिया) राज्य के पदों को स्वीकार करते थे, शासकों के करीबी थे और धन संचय को अध्यात्म में बाधक नहीं मानते थे।
जनता से जुड़ाव: चिश्ती सिलसिले का केंद्र आम जनता, गरीब और शोषित वर्ग थे। उन्होंने संगीत (शमा) को ईश्वर प्राप्ति का माध्यम माना। जबकि सुहरावर्दी मुख्य रूप से कुलीन और उच्च वर्ग तक सीमित रहे और संगीत गोष्ठियों के प्रति उदासीन थे।
भौगोलिक क्षेत्र: चिश्ती पूरे उत्तर और मध्य भारत में फैले, जबकि सुहरावर्दी मुख्यतः पंजाब और सिंध क्षेत्र में सक्रिय रहे।
विशेष आभार (Special Thanks): इस प्रश्नोत्तरी/सामग्री को तैयार करने में अपना अमूल्य योगदान देने वाले सम्मानित लेखकगण — श्री पी. के. नागौरी एवं श्रीमती रजनी जी तनेजा का हम सहृदय धन्यवाद करते हैं।
दोस्तों, आशा है कि यह पोस्ट आपकी UPSC और RAS मुख्य परीक्षा की तैयारी में मददगार साबित होगी। आपको यह क्विज़ कैसी लगी? अपने विचार और सुझाव कमेंट सेक्शन में ज़रूर शेयर करें! निरंतर मेहनत करते रहें। इस पोस्ट को अपने साथी एस्पिरेंट्स के साथ भी शेयर करें। यदि आप ऐसे और भी क्विज़ अटेंप्ट करना चाहते हैं, तो तुरंत 9015746713 पर WhatsApp मैसेज करें। Stay consistent, success is yours!
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