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प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के धार्मिक आंदोलन और धर्म दर्शन | UPSC & RAS Special

प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के धार्मिक आंदोलन और धर्म दर्शन | UPSC & RAS Special

यदि आप UPSC (IAS) या RPSC (RAS) मुख्य परीक्षा के गंभीर अभ्यर्थी हैं, तो पाठ्यक्रम का सबसे अमूर्त और वैचारिक खंड "प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के धार्मिक आंदोलन और धर्म दर्शन" (Religious Movements and Philosophies) है। इस खंड से प्रतिवर्ष मुख्य परीक्षा में विश्लेषणात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं, जहाँ सामान्य उत्तरों के स्थान पर दार्शनिक स्पष्टता (Philosophical Clarity) और सटीक उत्तर-लेखन शैली ही आपको अन्यों से बढ़त दिलाती है। यह विशेष ब्लॉग पोस्ट आपको परीक्षा के नवीन पैटर्न के अनुसार लघूतरात्मक (50-60 शब्द) एवं निबन्धात्मक (100-150 शब्द) श्रेणियों में आदर्श उत्तर फ्रेमिंग प्रदान करेगी। यदि आप मुख्य परीक्षा में उच्च अंक प्राप्त करना चाहते हैं, तो उत्तर-लेखन की इस मानक शैली को समझने और अपने अंकों को बूस्ट करने के लिए इस पोस्ट को अंत तक अवश्य पढ़ें!

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लघूतरात्मक प्रश्न (शब्द सीमा: 50 से 60 शब्द)

प्र 1. बोधिसत्व से क्या अभिप्राय है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: बोधिसत्व बौद्ध दर्शन (विशेषकर महायान) की वह केंद्रीय संकल्पना है, जो बुद्धत्व प्राप्त करने के पूर्व बुद्ध के विभिन्न जन्मों को दर्शाती है। यह ऐसे करुणाशील स्वरूप का प्रतीक है जो समस्त संसार के कल्याण और मुक्ति के लिए कार्य करता है तथा जन-कल्याण हेतु स्वेच्छा से स्वयं के निर्वाण (जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति) को स्थगित कर देता है।

प्र 2. प्राचीन भारत के चार सोम यज्ञों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: वैदिक कर्मकांड परंपरा में 'सोम रस' की आहुति से जुड़े सोम यज्ञ अत्यंत महत्वपूर्ण थे। इनमें प्रमुख रूप से निम्नलिखित चार सोम यज्ञों का उल्लेख मिलता है:

  1. अग्निष्टोम: यह सबसे आधारभूत सोम यज्ञ था।
  2. अत्यग्निष्ठोम: यह अग्निष्टोम का ही विस्तारित रूप था।
  3. अतिरात्र: यह रात्रि में संपन्न होने वाला यज्ञ था।
  4. वाजपेय: यह शौर्य और शक्ति प्रदर्शन (रथ दौड़) से संबंधित प्रतिष्ठित यज्ञ था।

प्र 3. आदि शंकराचार्य और उनके दार्शनिक अवदान पर प्रकाश डालिए।

उत्तर: 788 ई. में केरल के कलाडी में जन्मे आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्म के पुनरुत्थान में युगांतकारी भूमिका निभाई। उन्होंने वेदांत दर्शन के अंतर्गत 'अद्वैतवाद' (जीव और ब्रह्म की अभिन्नता) मत का प्रतिपादन किया। सांस्कृतिक एकता हेतु उन्होंने भारत के चार कोनों में चार पीठ स्थापित किए: उत्तर में केदारनाथ (ज्योतिर्मठ), दक्षिण में श्रृंगेरी, पूर्व में जगन्नाथ पुरी (गोवर्धन) और पश्चिम में द्वारिका (शारदामठ)।

प्र 4. सूफी मत के 'सत्तारी सिलसिला' पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर: सत्तारी सिलसिला भारत में सूफी मत की एक प्रमुख रहस्यवादी शाखा थी। इसकी स्थापना लोदी राजवंश के शासनकाल में 1485 ई. के दौरान सैयद अब्दुल्लाह सत्तारी द्वारा की गई थी। इस सिलसिले का मूल दृष्टिकोण अत्यंत तात्कालिक और गहन था; सैयद अब्दुल्लाह के अनुसार, "जो भी साधक ईश्वर को प्राप्त करना चाहता है, वह मेरे पास आए, मैं उसे साक्षात ईश्वर तक पहुँचा दूँगा।"

प्र 5. दक्षिण भारत के 'अलवार संतों' के बारे में बताइए।

उत्तर: मध्यकाल (6वीं से 9वीं शताब्दी) में तमिल क्षेत्र में भक्ति आंदोलन का सूत्रपात करने वाले 12 वैष्णव संत 'अलवार' कहलाए। अलवार का शाब्दिक अर्थ है 'ईश्वर की भक्ति में डूबा हुआ'। इन संतों में प्रसिद्ध महिला संत अंडाल भी शामिल थीं। इनके द्वारा रचित भावपूर्ण भजनों का संकलन 'नित्य दिव्य प्रबंधम' नामक अत्यंत आदरणीय तमिल ग्रंथ में किया गया है।

प्र 6. सूफी एवं भक्त संतों के उपदेशों में विद्यमान समानताओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: सूफी और भक्ति संतों के मध्य अद्भुत वैचारिक साम्यता थी:

  1. कट्टरता का विरोध: दोनों ने क्रमशः तत्कालीन मुस्लिम और हिंदू रूढ़िवादिता व बाह्य आडंबरों का खंडन किया।
  2. भाषाई सरलीकरण: अरबी-संस्कृत के स्थान पर लोक भाषाओं (क्षेत्रीय बोलियों) को माध्यम बनाया।
  3. दार्शनिक समानता: दोनों में एकेश्वरवाद, ईश्वर के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण, गुरु/पीर की सर्वोच्चता, पवित्र-सादा जीवन, प्रेम मार्ग और नाम-स्मरण/प्रार्थना के तत्वों की प्रधानता थी।

प्र 7. बौद्ध धर्म के 'अष्टांगिक मार्ग' के प्रमुख तत्वों को रेखांकित कीजिए।

उत्तर: अष्टांगिक मार्ग दुख निरोध का व्यावहारिक साधन है, जिसे तीन मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है: प्रज्ञा (सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प), शील (सम्यक वाक, सम्यक कर्मान्त, सम्यक आजीव), और समाधि (सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि)। यह मध्यम मार्ग का अनुसरण करते हुए व्यक्ति को नैतिक जीवन जीने और मोक्ष (निर्वाण) प्राप्त करने की दिशा दिखाता है।

प्र 8. जैन धर्म के 'स्याद्वाद' या 'अनेकांतवाद' के सिद्धांत से आप क्या समझते हैं?

उत्तर संकेत: स्याद्वाद जैन दर्शन का ज्ञानमीमांसा का सिद्धांत है, जिसके अनुसार किसी भी वस्तु या सत्य के अनेक पहलू (अनेकांतवाद) होते हैं। मानव का ज्ञान सीमित और सापेक्ष होता है, इसलिए किसी भी निर्णय के आगे 'स्यात' (शायद/किसी अपेक्षा से) लगाना जरूरी है। यह सिद्धांत वैचारिक सहिष्णुता और दूसरों के विचारों के सम्मान पर बल देता है।

प्र 9. मध्यकाल में भारत में 'सूफ़ी आंदोलन' के उद्भव के मुख्य कारण क्या थे?

उत्तर: सूफ़ी आंदोलन का उदय रूढ़िवादी इस्लामिक कट्टरता के विरोध, सांसारिक विलासिता के त्याग और ईश्वर के प्रति प्रेम-भक्ति पर आधारित था। हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक संपर्क, स्थानीय लोक भाषाओं का प्रयोग, और खानकाहों (सूफ़ी संतों के निवास स्थान) द्वारा सामाजिक समरसता व समानता का संदेश देने के कारण यह आंदोलन आम जनता में तेजी से लोकप्रिय हुआ।

प्र 10. अलवार और नयनार संतों ने दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन को कैसे आकार दिया?

उत्तर: 6वीं से 9वीं शताब्दी के बीच दक्षिण भारत (तमिलनाडु) में अलवार (विष्णु भक्त) और नयनार (शिव भक्त) संतों ने भक्ति का प्रसार किया। उन्होंने जाति व्यवस्था का विरोध किया, महिलाओं को आंदोलन में शामिल किया और स्थानीय तमिल भाषा में भजनों (जैसे दिव्य प्रबंधम) की रचना की। उन्होंने धर्म को कर्मकांडों से निकालकर व्यक्तिगत प्रेम और समर्पण का मार्ग बनाया।

प्र 11. शंकराचार्य के 'अद्वैत वेदांत' दर्शन के मूल तत्व क्या हैं?

उत्तर: आदि शंकराचार्य का अद्वैत दर्शन 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः' पर आधारित है। इसके अनुसार केवल ब्रह्म ही एकमात्र परम सत्य है, और यह दृश्य जगत माया (अज्ञान) के कारण सत्य प्रतीत होता है। आत्मा और ब्रह्म दो अलग सत्ताएँ नहीं बल्कि एक ही हैं। ज्ञान मार्ग के द्वारा इस अज्ञान को मिटाकर मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।

निबन्धात्मक प्रश्न (शब्द सीमा: 100 से 150 शब्द)

प्र 12. बौद्ध धर्म के हीनयान और महायान संप्रदायों में मुख्य दार्शनिक मतभेद क्या हैं? विवेचना कीजिए।

उत्तर: चतुर्थ बौद्ध संगीति में बौद्ध धर्म वैचारिक मतभेदों के कारण हीनयान और महायान में विभाजित हो गया, जिनके दार्शनिक अंतर निम्नलिखित हैं:

  1. बुद्ध का स्वरूप व मोक्ष: हीनयान बुद्ध को एक महापुरुष मानता है और व्यक्तिगत प्रयासों से 'अर्हत' पद (व्यक्तिगत मोक्ष) की प्राप्ति पर बल देता है। इसके विपरीत, महायान बुद्ध को ईश्वर मानकर अवतारवाद और मूर्तिपूजा में विश्वास करता है, जहाँ आदर्श 'बोधिसत्व' (वैश्विक कल्याण) है।
  2. भाषाई व व्यावहारिक अंतर: हीनयान के मूल ग्रंथ पारंपरिक 'पाली' भाषा में हैं और यह रूढ़िवादी व कठोर दार्शनिकता पर आधारित है। महायान ने 'संस्कृत' को अपनाया और यह अधिक व्यावहारिक, परिवर्तनशील व उदार है।
  3. मूल प्रेरक तत्व: हीनयान ज्ञान (प्रज्ञा) और कठोर अनुशासन पर केंद्रित है, जबकि महायान करुणा, भक्ति और परोपकार को मोक्ष का साधन मानता है।

संक्षेप में, हीनयान जहाँ अपरिवर्तनशील और व्यक्तिवादी है, वहीं महायान लोक-कल्याणकारी और समयानुकूल परिवर्तनशील है।

प्र 13. भारतीय दर्शन के 'षड्दर्शन' (Six Systems of Indian Philosophy) से आप क्या समझते हैं? संक्षेप में समझाइए।

उत्तर: सनातन परंपरा में वेदों की प्रमाणिकता को स्वीकार करने वाले छह आस्तिक दार्शनिक संप्रदायों को 'षड्दर्शन' कहा जाता है, जो मानव जीवन के अंतिम लक्ष्य (मोक्ष) को परिभाषित करते हैं:

  1. सांख्य दर्शन: महर्षि कपिल द्वारा प्रवर्तित; यह कारणता के सिद्धांत (सत्कार्यवाद) और प्रकृति-पुरुष के द्वैत (अनेकात्मवाद) पर आधारित है। (अन्य विद्वान: ईश्वरकृष्ण)।
  2. योग दर्शन: महर्षि पतंजलि द्वारा रचित; यह चित्तवृत्ति के निरोध और अष्टांग योग के माध्यम से आत्मा का परमात्मा से मिलन प्रतिपादित करता है।
  3. न्याय दर्शन: महर्षि गौतम द्वारा प्रवर्तित; यह तर्कशास्त्र और प्रमाणों के आधार पर सत्य की खोज करने वाला विश्लेषणात्मक दर्शन है। (अन्य विद्वान: वात्स्यायन)।
  4. वैशेषिक दर्शन: महर्षि कणाद द्वारा प्रतिपादित; यह ब्रह्मांड की रचना की व्याख्या 'परमाणुवाद' के सिद्धांत से करता है।
  5. मीमांसा (पूर्व मीमांसा): महर्षि जैमिनी द्वारा रचित; यह वैदिक कर्मकांडों, यज्ञों और मंत्रों की दार्शनिकता व महत्ता की व्याख्या करता है।
  6. वेदांत (उत्तर मीमांसा): महर्षि बादरायण द्वारा सूत्रबद्ध; यह उपनिषदों के ज्ञान पर आधारित है, जिसमें अद्वैत, द्वैत आदि मतों का विकास हुआ। (अन्य विद्वान: शंकराचार्य, रामानुज)।

प्र 14. भक्ति आंदोलन के वैचारिक स्रोतों को रेखांकित करते हुए भारतीय समाज पर इसके तत्कालीन प्रभावों का मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर: भक्ति के वैचारिक स्रोत: भक्ति की आद्य-ऐतिहासिक जड़ें सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों में मिलती हैं, जो वैदिक काल और विशेषकर 'श्रीमद्भगवद्गीता' में ज्ञान, कर्म व भक्ति के त्रिमार्ग के रूप में स्थापित हुईं। बौद्ध धर्म ने वैदिक प्रभुत्व के विरुद्ध नैतिक आचरण को केंद्र में रखा। मध्यकाल में आदि शंकराचार्य ने ज्ञान मार्ग से इसका दार्शनिक प्रतिपादन किया, जिसे आगे चलकर रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य आदि ने सगुण भक्ति तथा कबीर-नानक ने निर्गुण एकेश्वरवाद की ओर मोड़ा। इस्लाम के आगमन के बाद सांस्कृतिक संरक्षण की आवश्यकता ने इसे एक आंदोलन का रूप दिया।

भारतीय समाज पर प्रभाव:

  1. सामाजिक सरलीकरण: जाति व्यवस्था, छुआछूत और जटिल पूजा-पद्धति पर प्रहार कर समाज में समतामूलक दृष्टिकोण विकसित किया।
  2. सांस्कृतिक समन्वय: हिंदू-मुस्लिम विषमताओं को कम कर सार्वभौम मानवतावाद और सूफी-भक्ति साझा संस्कृति (गंगा-जमुनी तहजीब) को बढ़ावा दिया।
  3. भाषाई विकास: प्रांतीय और लोक भाषाओं (हिंदी, बंगाली, मराठी) में विपुल साहित्य का सृजन हुआ।
  4. नवजागरण: राजनीतिक निराशा के दौर में हिंदू समाज में नव-स्फूर्ति, सुरक्षा भाव और राष्ट्रीय चेतना का संचार किया, जिससे कालांतर में सिखों, जाटों और मराठों का राजनीतिक उदय संभव हो सका।

प्र 15. "भक्ति आंदोलन ने केवल धार्मिक क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि मध्यकालीन भारतीय समाज और संस्कृति में भी क्रांतिकारी बदलाव किए।" मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर संकेत: भक्ति आंदोलन ने धार्मिक क्षेत्र के साथ-साथ गहरे सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव किए:

  1. सामाजिक समानता: कबीर, नानक और रैदास जैसे संतों ने जन्म-आधारित जाति व्यवस्था, छुआछूत और लैंगिक भेदभाव पर कड़ा प्रहार किया और समाज को समानता का पाठ पढ़ाया।
  2. कर्मकांडों का विरोध: आडंबरों, मूर्तिपूजा और पुरोहितवाद की जगह आंतरिक पवित्रता और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण (प्रपत्ति) पर बल दिया।
  3. सांस्कृतिक व भाषाई विकास: संस्कृत के स्थान पर अवधी, ब्रज, बंगाली और मराठी जैसी क्षेत्रीय भाषाओं का विकास हुआ, जिससे साहित्य आम जनता तक पहुँचा।
  4. सांस्कृतिक संश्लेषण: भक्ति संतों और सूफ़ी विचारों के मिलन से हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा मिला और गंगा-जमुनी तहज़ीब की नींव मजबूत हुई।

प्रश्न 16. छठी शताब्दी ईसा पूर्व में उत्तर भारत में बौद्ध और जैन धर्म के उदय के लिए उत्तरदायी सामाजिक-आर्थिक और धार्मिक परिस्थितियों का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर संकेत: इस काल में नए धार्मिक आंदोलनों के उदय के पीछे निम्नलिखित परिस्थितियाँ थीं:

  1. धार्मिक कारण: वैदिक धर्म अत्यधिक जटिल, खर्चीला और कर्मकांडीय हो चुका था। पशुबलि की अधिकता से आम जनता परेशान थी
  2. आर्थिक कारण: लोहे के प्रयोग से द्वितीय नगरीकरण और कृषि का विस्तार हुआ। कृषि के लिए पशुधन (बैल) की रक्षा जरूरी थी, जो वैदिक पशुबलि के विपरीत थी। वैश्य वर्ग का आर्थिक प्रभाव बढ़ा, लेकिन सामाजिक पदानुक्रम में उनका स्थान नीचे था, इसलिए वे एक ऐसे धर्म की तलाश में थे जो उनकी स्थिति को स्वीकार करे
  3. सामाजिक कारण: ब्राह्मणवादी व्यवस्था में कठोर जाति प्रथा और क्षत्रियों की सर्वोच्चता की आकांक्षा ने भी नई सोच को जन्म दिया। बुद्ध और महावीर दोनों क्षत्रिय थे, जिन्होंने इस व्यवस्था को चुनौती दी।

प्रश्न 17. मध्यकालीन भारत में सूफ़ी संतों की चिश्ती और सुहरावर्दी परंपराओं (सिलसिलों) के दृष्टिकोण और कार्यप्रणाली की तुलना कीजिए।

उत्तर संकेत: चिश्ती और सुहरावर्दी दोनों ही भारत के प्रमुख सूफ़ी सिलसिले थे, लेकिन उनकी कार्यप्रणाली में स्पष्ट अंतर था:

राज्याश्रय और धन: चिश्ती संत (जैसे ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती) राजकीय संरक्षण और धन-दौलत से दूर रहते थे। वे गरीबी और सादगीपूर्ण जीवन (फ़क्र) को प्राथमिकता देते थे। इसके विपरीत, सुहरावर्दी संत (जैसे बहाउद्दीन जकारिया) राज्य के पदों को स्वीकार करते थे, शासकों के करीबी थे और धन संचय को अध्यात्म में बाधक नहीं मानते थे।

जनता से जुड़ाव: चिश्ती सिलसिले का केंद्र आम जनता, गरीब और शोषित वर्ग थे। उन्होंने संगीत (शमा) को ईश्वर प्राप्ति का माध्यम माना। जबकि सुहरावर्दी मुख्य रूप से कुलीन और उच्च वर्ग तक सीमित रहे और संगीत गोष्ठियों के प्रति उदासीन थे।

भौगोलिक क्षेत्र: चिश्ती पूरे उत्तर और मध्य भारत में फैले, जबकि सुहरावर्दी मुख्यतः पंजाब और सिंध क्षेत्र में सक्रिय रहे।

 

विशेष आभार (Special Thanks): इस प्रश्नोत्तरी/सामग्री को तैयार करने में अपना अमूल्य योगदान देने वाले सम्मानित लेखकगण — श्री पी. के. नागौरी एवं श्रीमती रजनी जी तनेजा का हम सहृदय धन्यवाद करते हैं।

अन्य महत्वपूर्ण नोट्स और टेस्ट इन्हें भी ज़रूर देखें।

दोस्तों, आशा है कि यह पोस्ट आपकी UPSC और RAS मुख्य परीक्षा की तैयारी में मददगार साबित होगी। आपको यह क्विज़ कैसी लगी? अपने विचार और सुझाव कमेंट सेक्शन में ज़रूर शेयर करें! निरंतर मेहनत करते रहें। इस पोस्ट को अपने साथी एस्पिरेंट्स के साथ भी शेयर करें। यदि आप ऐसे और भी क्विज़ अटेंप्ट करना चाहते हैं, तो तुरंत 9015746713 पर WhatsApp मैसेज करें। Stay consistent, success is yours!

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