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राजस्थान का इतिहास: प्रागैतिहासिक काल से 18वीं शताब्दी | राजवंश

राजस्थान का इतिहास: प्रागैतिहासिक काल से 18वीं शताब्दी | राजवंश

यह पोस्ट UPSC (IAS) मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-I (इतिहास व संस्कृति) तथा RAS मुख्य परीक्षा के प्रश्नपत्र-I (इकाई-1: राजस्थान का इतिहास, कला व संस्कृति) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस पोस्ट में 'प्रागैतिहासिक काल से 18वीं शताब्दी तक राजस्थान के इतिहास के सोपान तथा प्रमुख राजवंशों' से जुड़े उन चुनिंदा प्रश्नों को शामिल किया गया है, जो मुख्य परीक्षा के उत्तर-लेखन (Answer Writing) में सटीक विश्लेषण, की-वर्ड्स (Keywords) के उपयोग और ऐतिहासिक समझ को विकसित करने में सीधे तौर पर मददगार हैं।

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अति-लघुउत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. "बीघोड़ी" (Bighodi)

उत्तर: मध्यकाल में राजस्थान में प्रचलित एक भूमि-राजस्व व्यवस्था। इसके अंतर्गत भूमि की उर्वरता (Fertility) और फसल की पैदावार के आधार पर प्रति बीघा के हिसाब से नकद या जिंस में राजस्व का निर्धारण किया जाता था।

प्रश्न 2. "सनद" (Sanad)

उत्तर: यह मुगल काल में जारी होने वाला एक आधिकारिक या शाही पट्टा/स्वीकृति पत्र था। इसके माध्यम से मुगल सम्राट अपने अधीनस्थ राजपूत राजाओं या जागीरदारों को उनके अधिकारों, भूमि या जागीर की संप्रभुता प्रदान या नवीनीकृत करता था।

प्रश्न 3. पुरंदर की संधि कब और किसके बीच हुई?

उत्तर: पुरंदर की संधि 11 जून 1665 को मुगल सेनापति मिर्जा राजा जयसिंह (आमेर) और छत्रपति शिवाजी महाराज के बीच हुई थी। इस संधि के तहत शिवाजी को अपने 23 किले मुगलों को सौंपने पड़े थे।

प्रश्न 4. "घुड़ला त्यौहार" (Ghudla Festival)

उत्तर: मारवाड़ (जोधपुर) क्षेत्र में चैत्र कृष्ण अष्टमी से चैत्र शुक्ल तृतीया तक मनाया जाने वाला लोक पर्व। यह मल्लू खान के सेनापति घुड़ले खां पर राव सातल की विजय की स्मृति में मनाया जाता है। इसमें स्त्रियां छिद्रित घड़े में दीपक जलाकर लोकगीत गाती हैं, जिसे बाद में तालाब में विसर्जित कर दिया जाता है। चैत्र शुक्ल तृतीया को यहाँ मेला लगता है।

लघुउत्तरात्मक / विवरणात्मक

प्रश्न 5. "औरंगजेब का काल राजपूत-मुगल सहयोग का अवसान काल (Decline Phase) था।" उक्त कथन को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: अकबर द्वारा शुरू की गई 'राजपूत गठबंधन' की नीति औरंगजेब की रूढ़िवादी और संकीर्ण नीतियों के कारण समाप्त हो गई, जिसे निम्नलिखित उदाहरणों से समझा जा सकता है:

  1. बीकानेर रियासत: औरंगजेब ने राव कर्णसिंह के विद्रोही रुख से रुष्ट होकर उन्हें अपदस्थ किया और उनके पुत्र अनूप सिंह को शासक बनाकर आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप किया।

  2. मारवाड़ संकट: महाराजा जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद औरंगजेब ने उनके नवजात पुत्र अजीत सिंह को शासक न मानकर नागौर के इंद्रसिंह को जोधपुर का 'टीका' भेजा। इसका वीर दुर्गादास राठौड़ के नेतृत्व में राठौड़ों ने कड़ा प्रतिरोध किया, जिससे 30 वर्षीय मुग़ल-राठौड़ युद्ध छिड़ गया।

  3. हाड़ौती (कोटा): कोटा के महाराव किशोर सिंह के उत्तराधिकारी रामसिंह को 'राव' की उपाधि देकर औरंगजेब ने यह संदेश दिया कि राजपूत राज्यों का भविष्य और संप्रभुता केवल सम्राट की इच्छा पर निर्भर है।

निष्कर्ष: औरंगजेब के इस अविश्वास और आक्रामक हस्तक्षेप ने मुगलों के सबसे मजबूत स्तंभ (राजपूतों) को उनका विरोधी बना दिया, जो मुगल साम्राज्य के पतन का मुख्य कारण बना।

प्रश्न 6. राव चंद्रसेन को 'प्रताप का अग्रगामी' तथा 'मारवाड़ का प्रताप' कहा जाता है, क्यों?

उत्तर: राव चंद्रसेन मारवाड़ के पहले ऐसे शासक थे जिन्होंने अकबर की अधीनता स्वीकार करने के बजाय स्वाधीनता का मार्ग चुना। उन्हें निम्नलिखित कारणों से प्रताप का अग्रगामी माना जाता है:

  • अदम्य स्वाभिमान: जहाँ उनके भाई (उदयसिंह व राम) शाही सत्ता और विलासिता का सुख भोग रहे थे, वहीं चंद्रसेन ने आर्थिक तंगी में अपने रत्न-आभूषण बेचकर भी मुगलों के सामने घुटने नहीं टेके।
  • गुरिल्ला युद्ध पद्धति: उन्होंने जोधपुर त्यागकर भाद्राजून और सिवाणा के पर्वतों को अपना केंद्र बनाया और मुगलों के खिलाफ सतत संघर्ष जारी रखा।
  • प्रताप के पथ-प्रदर्शक: चंद्रसेन ने मुगलों से प्रतिरोध की जिस सैन्य नीति, पहाड़ों की शरण लेने और स्वाधीनता के जिस आदर्श की शुरुआत की, उसी राह पर आगे चलकर महाराणा प्रताप ने मेवाड़ में ख्याति अर्जित की। इसलिए वे 'मारवाड़ के प्रताप' कहलाते हैं।

प्रश्न 7. महाराणा प्रताप की प्रमुख चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

उत्तर: महाराणा प्रताप का चरित्र भारतीय इतिहास में वीरता, नैतिकता और मानवीय मूल्यों का अनुपम उदाहरण है:

  1. युद्ध नैतिकता व समर नीति: उन्होंने कभी निहत्थे शत्रु पर वार नहीं किया। वे सदैव अपने साथ दो तलवारें रखते थे ताकि निहत्थे दुश्मन को बराबरी का मौका दे सकें।
  2. सामाजिक समरसता व सर्वसमावेशी नेतृत्व: मेवाड़ का राजचिह्न (जिसमें एक तरफ क्षत्रिय और दूसरी तरफ भील योद्धा पूंजा अंकित हैं) उनकी सामाजिक समरसता को दर्शाता है। समाज का हर वर्ग उनके लिए प्राण न्योछावर करने को तत्पर था।
  3. अदम्य स्वाधीनता प्रेमी: घोर संकट, जंगलों की खाक छानने और महलों के वैभव को त्यागने के बाद भी उन्होंने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की।
  4. धर्म और राष्ट्र-चिह्न की रक्षा: उनका मूल मंत्र था— "जो दृढ़ राखे धर्म को, तिहि राखे करतार" अर्थात् जो धर्म (कर्तव्य) पर अडिग रहता है, ईश्वर उसकी रक्षा करता है।
  5. नारी सम्मान के प्रणेता: 1580 में शेरपुर अभियान के दौरान जब कुंवर अमरसिंह ने मुगल सूबेदार अब्दुर्रहीम खानखाना के परिवार को बंदी बना लिया, तब प्रताप ने खानखाना की स्त्रियों और बच्चों को पूर्ण सम्मान के साथ सुरक्षित वापस भेजने का आदेश दिया।
  6. प्रेरक व्यक्तित्व: उनके इसी विलक्षण और ईमानदार नेतृत्व से प्रभावित होकर दानवीर भामाशाह ने अपनी जीवनभर की पूंजी उनके चरणों में समर्पित कर दी थी।

प्रश्न 8. पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) का ऐतिहासिक मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर: शाकंभरी के चौहान शासक पृथ्वीराज तृतीय मध्यकालीन भारत के एक अत्यंत प्रभावशाली और बहुआयामी शासक थे:

सैनिक नेतृत्व व साम्राज्य विस्तार: वे एक असाधारण वीर और कुशल रणनीतिकार थे। अपने शासनकाल के आरंभ से ही उन्होंने दिग्विजय की नीति अपनाई और कई युद्धों में विजय प्राप्त कर "दलपुंगल" (विश्व विजेता) की उपाधि धारण की। वे तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में गोरी के छल-कपट से पूर्व किसी भी मुख्य युद्ध में पराजित नहीं हुए थे।

सांस्कृतिक व साहित्यिक अनुरागी: एक महान योद्धा होने के साथ-साथ वे विद्या और विद्वानों के आश्रयदाता थे। उनके दरबार में कला एवं साहित्य विभाग स्थापित था।

विद्वानों का संरक्षण: उनके दरबार को विद्यापति गौड़, वागीश्वरी, जनार्दन, जयानक (पृथ्वीराज विजय के लेखक), विश्वरूप और आशाधर जैसे प्रकांड विद्वानों ने सुशोभित किया। उनके राजकवि और मित्र चंदबरदाई द्वारा रचित "पृथ्वीराज रासो" को हिंदी साहित्य का प्रथम महाकाव्य होने का गौरव प्राप्त है।

समीक्षात्मक / विश्लेषणात्मक प्रश्न

प्रश्न 4. पृथ्वीराज चौहान की हार के प्रमुख कारणों की समीक्षा कीजिए।

उत्तर: तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में पृथ्वीराज चौहान की पराजय भारत के इतिहास में एक युगांतरकारी घटना थी। उनकी हार के मुख्य रणनीतिक और कूटनीतिक कारण निम्नलिखित थे:

  1. दूरदर्शिता और कूटनीति का अभाव: पृथ्वीराज ने 'दिग्विजय' की नीति के तहत अपने पड़ोसी राज्यों (जैसे चंदेलों, चालुक्यों और कन्नौज के जयचंद) से युद्ध मोल ले लिए। इस कारण गोरी के खिलाफ संकट के समय उन्हें किसी भी क्षेत्रीय शक्ति का सैन्य सहयोग नहीं मिला।
  2. सामरिक भूलें (Strategic Errors): 1178 ई. में जब मोहम्मद गोरी ने गुजरात के शासक भीमदेव द्वितीय पर आक्रमण किया, तब पृथ्वीराज की तटस्थता की नीति एक बड़ी भूल साबित हुई। यदि वे तब गुजरात का साथ देते, तो गोरी का सफाया तभी हो जाता।
  3. तराइन के प्रथम युद्ध के बाद शिथिलता: 1191 ई. में तराइन के प्रथम युद्ध में पराजित होकर भागती हुई तुर्क सेना पर पृथ्वीराज ने पीछा करके हमला नहीं किया। यह एक भयंकर सैन्य भूल थी, जिसने गोरी को पुनर्गठन का समय दे दिया।
  4. राजकार्यों की उपेक्षा: कन्नौज की राजकुमारी संयोगिता से विवाह के बाद, वे देश पर मंडराते बाहरी तुर्क खतरे के प्रति सचेत रहने के बजाय विलासिता और आंतरिक आमोद-प्रमोद में व्यस्त हो गए, जिससे सैन्य सतर्कता कमजोर हुई।

प्रश्न 5. राणा सांगा की खानवा के युद्ध (1527 ई.) में पराजय के प्रमुख कारणों का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर: महाराणा सांगा तत्कालीन भारत के सबसे शक्तिशाली हिंदू राजा थे, परंतु खानवा के युद्ध में बाबर के हाथों उनकी पराजय के पीछे कई सैन्य, कूटनीतिक और व्यक्तिगत कारण जिम्मेदार थे:

  1. सामरिक विलंब (बयाना विजय के बाद): इतिहासकार जी.एच. ओझा के अनुसार, सांगा की सबसे बड़ी भूल बयाना की जीत के तुरंत बाद बाबर पर हमला न करना था। उन्होंने युद्ध को लंबे समय तक टाला, जिससे बाबर को अपनी सेना का मनोबल बढ़ाने, खाइयां खोदने और तोपखाने को व्यवस्थित करने का पूरा समय मिल गया।
  2. परंपरागत बनाम आधुनिक युद्ध प्रणाली: राजपूत सैनिक वीरता से लड़े परंतु वे पारंपरिक हथियारों (तीर-कमान, भाले, तलवारें) पर निर्भर थे। वे बाबर के आधुनिक तोपखाने (Artillery) और मारक तुलगुमा युद्ध पद्धति का मुकाबला नहीं कर सके।
  3. सैन्य संगठन में एकता का अभाव: सांगा की सेना 'पाती पेरवन' परंपरा के तहत विभिन्न राजपूत सरदारों के नेतृत्व में इकठ्ठा हुई थी। सरदारों के अपने-अपने राजनीतिक स्वार्थ थे और उनमें आपसी तालमेल व केंद्रीय कमान व्यवस्था की कमी थी। लंबे विलंब के कारण उनका शुरुआती जोश भी ठंडा पड़ गया था।
  4. सांगा की व्यक्तिगत चूक: युद्ध के मैदान में सांगा का स्वयं हाथी पर सवार होना आत्मघाती साबित हुआ। वे शत्रु के निशाने पर आ गए और तीर लगने से घायल हो गए। उनके युद्ध भूमि से हटते ही सेना में भ्रम फैल गया और मनोबल टूट गया।
  5. अश्वसेना की गतिशीलता और हाथियों का उल्टा असर: बाबर की अत्यधिक गतिशील घुड़सवार सेना राजपूतों पर भारी पड़ी। साथ ही, बाबर के बारूद और तोपों के गोलों की आवाज से सांगा के हाथी डरकर पीछे भागे और उन्होंने अपनी ही सेना को कुचल दिया।

Specially thanks to Post Author - दिनेश मीना झालरा, टोंक

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