

"राजस्थान इतिहास: 19वीं-20वीं शताब्दी की प्रमुख घटनाएं" विषयक यह संकलन UPSC (IAS) और RPSC (RAS) मुख्य परीक्षा के नवीनतम पाठ्यक्रम को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। सिविल सेवा परीक्षाओं में राजस्थान के आधुनिक इतिहास, जन-आंदोलनों, सामाजिक-प्रशासनिक सुधारों और एकीकरण से जुड़े प्रश्न निरंतर पूछे जाते हैं। यह ब्लॉग पोस्ट अभ्यर्थियों को मुख्य परीक्षा के उत्तर-लेखन में सटीक शब्दावली और निर्धारित शब्द-सीमा (लघूतरात्मक: 50-60 शब्द तथा निबन्धात्मक: 100-120 शब्द) के भीतर प्रभावी उत्तर प्रस्तुत करने की कला सिखाने में अत्यधिक सहायक सिद्ध होगी।
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उत्तर: 2 जुलाई 1877 को महाराणा सज्जन सिंह की अध्यक्षता में उदयपुर में 'देश हितैषिणी सभा' का गठन किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य राजपूताना की रियासतों में राजपूतों, ब्राह्मणों और महाजनों के बीच वैवाहिक समस्याओं (जैसे विवाह पर होने वाले अत्यधिक खर्च) को सुलझाना तथा बहु-विवाह प्रथा पर रोक लगाना था। यद्यपि इसके कुछ अपेक्षित और सकारात्मक परिणाम निकले, किंतु यह पूर्णतः सफल नहीं हो सकी।
उत्तर: आउवा (पाली) के ठाकुर कुशाल सिंह चांपावत 1857 की क्रांति के प्रखर नायक और सुगाली माता के अनन्य भक्त थे। उन्होंने एरिनपुरा छावनी के बागी सैनिकों को कुशल नेतृत्व प्रदान किया। जोधपुर राजकीय सेना और कैप्टन मोक मेसन की ब्रिटिश सेना को क्रमशः बिथोड़ा और चेलावास के युद्धों (1857) में पराजित कर अदम्य साहस का परिचय दिया।
उत्तर: राजस्थान एकीकरण के चतुर्थ चरण में 30 मार्च 1949 को चार बड़ी रियासतों—जयपुर, जोधपुर, बीकानेर और जैसलमेर का 'संयुक्त राजस्थान' में विलय हुआ, जिससे 'वृहद् राजस्थान' का निर्माण हुआ। पी. सत्यनारायण राव समिति की सिफारिश पर जयपुर को राजधानी बनाया गया। इस ऐतिहासिक घटना से सदियों पुराना निरंकुश राजतंत्र समाप्त हुआ, इसीलिए प्रतिवर्ष 30 मार्च को 'राजस्थान दिवस' मनाया जाता है।
उत्तर: मारवाड़ राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना, नागरिक अधिकारों की रक्षा और महाराजा के संरक्षण में लोकतांत्रिक अधिकारों की प्राप्ति हेतु 1934 ई. में जोधपुर में मारवाड़ प्रजामंडल की स्थापना की गई। इसके प्रथम अध्यक्ष भंवरलाल सर्राफ थे, जबकि जयनारायण व्यास इसके मुख्य सूत्रधार थे।
उत्तर: प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी माणिक्य लाल वर्मा ने वर्ष 1934 में डूंगरपुर के सागवाड़ा से 10 मील दूर 'भीलों की पाल' के मध्य खांडलाई आश्रम की स्थापना की। इसका मुख्य उद्देश्य आदिवासी भीलों एवं हरिजनों में शिक्षा का प्रसार करना, सामाजिक कुप्रथाओं को दूर करना तथा उनका सामाजिक-आर्थिक उत्थान कर उनमें राजनीतिक चेतना जागृत करना था।
उत्तर: मेवाड़, वागड़ और आसपास के अंचल में भील, गरासिया आदि जनजातियों के नैतिक, सामाजिक उत्थान तथा उनमें राजनीतिक चेतना जागृत करने के उद्देश्य से 1883 ई. में गोविंद गिरी द्वारा डूंगरपुर में 'सम्प सभा' की स्थापना की गई। 'सम्प' का अर्थ आपसी एकता और प्रेम है। इसके माध्यम से समाज सुधार और स्वदेशी आंदोलन को बल मिला।
उत्तर: 1. ठाकुर कुशाल सिंह चांपावत: 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के सैन्य नायक।
2. विजय सिंह पथिक: बिजोलिया किसान आंदोलन के प्रणेता।
3. अर्जुन लाल सेठी: जयपुर में जैन वर्धमान विद्यालय के माध्यम से क्रांतिकारियों के शिक्षक।
4. ज्वाला प्रसाद शर्मा: राजस्थान में सशस्त्र क्रांति के सक्रिय कार्यकर्ता।
इन सभी ने मातृभूमि की मुक्ति के लिए सशस्त्र संघर्ष और जन-जागृति का मार्ग चुना।
उत्तर: राजस्थान के राजाओं, सामंतों और नवयुवकों को ब्रिटिश विरोधी क्रांतिकारी गतिविधियों से जोड़ने तथा सशस्त्र क्रांति की भावना जागृत करने के लिए 1910 ई. में केसरी सिंह बारहट, विजय सिंह पथिक और राव गोपाल सिंह खरवा ने 'वीर भारत सभा' की स्थापना की। यह गुप्त संगठन क्रांतिकारियों को संसाधन व प्रशिक्षण उपलब्ध कराता था।
उत्तर: विभिन्न देशी राज्यों की जनता के राजनीतिक आंदोलनों को एक सूत्र में पिरोने और राजाओं के तत्वावधान में उत्तरदायी शासन की स्थापना हेतु दिसंबर 1927 में बंबई में 'अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद' की स्थापना की गई। दीवान बहादुर रामचंद्र राव इसके प्रथम अध्यक्ष निर्वाचित हुए, जिससे रियासती आंदोलनों को राष्ट्रीय पहचान मिली।
उत्तर: 1 नवंबर 1956 को राजस्थान के एकीकरण का सातवां व अंतिम चरण पूर्ण हुआ। इस दिन अजमेर-मेरवाड़ा, आबू देलवाड़ा और सुनील टप्पा का विलय कर वर्तमान राजस्थान का स्वरूप सामने आया। राजप्रमुख का पद समाप्त कर राज्यपाल पद सृजित हुआ और पूर्ण लोकतंत्र स्थापित हुआ। इसीलिए 1 नवंबर को 'राजस्थान स्थापना दिवस' के रूप में मनाया जाता है।
उत्तर: अलवर रियासत में लगान दरों में अत्यधिक वृद्धि के विरोध में 14 मई 1925 को किसान नीमूचना गाँव में एकत्रित हुए। इस शांतिपूर्ण सभा पर कमांडर छज्जू सिंह के आदेश पर पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां बरसाईं, जिससे सैकड़ों किसान मारे गए। घरों को जलाया गया और अमानवीय अत्याचार किए गए। महात्मा गांधी ने इसे 'जलियांवाला बाग हत्याकांड' से भी अधिक विभत्स व 'दोहरी डायरशाही' (Dyerism Double Distilled) कहा। अंततः अलवर नरेश को झुकना पड़ा और लगान रियायतें देनी पड़ीं।
उत्तर: जैसलमेर में जन्मे सागरमल गोपा ने वहां की निरंकुश और अत्याचारी राजशाही का कड़ा विरोध किया। उन्होंने जनता में चेतना जगाने के लिए 'आजादी के दीवाने' और 'जैसलमेर में गुंडाराज' जैसी क्रांतिकारी पुस्तकें प्रकाशित कीं। इसके कारण उन्हें राजद्रोह के झूठे आरोप में 24 मई 1941 को जेल में डाल दिया गया। जेल में उन पर अमानवीय यातनाएं दी गईं और अंततः 4 अप्रैल 1946 को तेल छिड़ककर उन्हें जीवित जला दिया गया।
उत्तर: राजपूतों के कारण: रियासतों में आंतरिक गृह-कलह, मराठों और पिंडारियों के अनवरत व कष्टदायी लूटपाट से सुरक्षा की आवश्यकता, सामंतों के बढ़ते विद्रोह तथा मुगलों के पतन के बाद केंद्रीय सत्ता का अभाव।
अंग्रेजों के कारण: भारत में अपनी सर्वोपरि सत्ता (Paramountcy) स्थापित करने की लॉर्ड हेस्टिंग्स की साम्राज्यवादी लालसा, पिंडारियों का दमन करना तथा राजपूताना को अपने प्रभाव में लेकर वित्तीय व सामरिक संसाधनों में वृद्धि करना।
उत्तर: मूल रूप से बुलंदशहर के भूप सिंह (विजय सिंह पथिक) की कर्मभूमि राजस्थान थी। वे भारत में किसान आंदोलन के जनक माने जाते हैं। उन्होंने 'वीर भारत सभा' और 'राजस्थान सेवा संघ' की स्थापना की तथा 'बिजोलिया किसान आंदोलन' का सफल नेतृत्व किया। उन्होंने 'राजस्थान केसरी' और 'नवीन राजस्थान' समाचार पत्रों के संपादन के माध्यम से जनता में चेतना का संचार किया तथा सशस्त्र क्रांति के लिए क्रांतिकारियों को तैयार किया।
उत्तर: सिरोही का विलय एकीकरण की सबसे जटिल समस्याओं में से एक था। नवंबर 1947 में सरदार पटेल ने प्रशासनिक नियंत्रण के तहत सिरोही को बंबई प्रांत में स्थानांतरित कर दिया। चूंकि सिरोही प्रख्यात नेता गोकुल भाई भट्ट की जन्मभूमि थी, इसलिए राजस्थान के नेताओं (विशेषकर हीरालाल शास्त्री) ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा कि 'गोकुल भाई के बिना हम राजस्थान नहीं चला सकते'।
अतः छठे चरण (जनवरी 1950) में आबू-देलवाड़ा को बंबई प्रांत में रखते हुए शेष सिरोही को राजस्थान में मिलाया गया। इस विभाजन के विरुद्ध सिरोही की जनता ने गोकुल भाई भट्ट के नेतृत्व में एक लंबा शांतिपूर्ण आंदोलन छेड़ा। अंततः राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के आधार पर एकीकरण के अंतिम चरण (1 नवंबर 1956) में आबू-देलवाड़ा सहित संपूर्ण सिरोही का राजस्थान में पूर्ण विलय हुआ और यह विवाद थमा।
उत्तर: राजस्थान में राजनीतिक चेतना और नागरिक अधिकारों के संघर्ष में महिलाओं का योगदान अद्वितीय रहा है। 1930 के नमक सत्याग्रह से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। अंजना देवी चौधरी (गिरफ्तार होने वाली प्रथम महिला), नारायणी देवी वर्मा (जो अपने छह माह के शिशु के साथ जेल गईं), रतन शास्त्री और प्रकाशवती सिन्हा ने आंदोलन का कुशल नेतृत्व किया।
बिजोलिया किसान आंदोलन के दौरान श्रीमती विजया, विमला देवी, रमा देवी जोशी जैसी स्त्रियों ने पुलिस दमन का साहसपूर्वक सामना किया। 1942 की अगस्त क्रांति में छात्राओं ने अपूर्व शौर्य दिखाया; कोटा में रामपुरा कोतवाली पर नियंत्रण करने वालों में छात्राएं भी शामिल थीं। जोधपुर में सावित्री देवी भाटी और सिरे कंवल व्यास ने गिरफ्तारियां दीं। वहीं वागड़ क्षेत्र के रास्तापाल में 13 वर्षीय भील बाला काली बाई ने अपने गुरु की जान बचाते हुए 19 जून 1947 को प्राणों की आहुति दे दी, जो महिला वीरता का सर्वोच्च प्रतीक है।
उत्तर: अजमेर-मेरवाड़ा प्रारंभ से ही ब्रिटिश भारत का एक सीधा शासित 'सी-श्रेणी' (C-Category) का प्रांत था। अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद की राजपूताना प्रांतीय सभा प्रारंभ से ही मांग कर रही थी कि इसका विलय वृहद् राजस्थान में किया जाए। किंतु अजमेर का स्थानीय कांग्रेस नेतृत्व इसके पक्ष में नहीं था।
1952 के आम चुनावों के बाद वहां श्री हरिभाऊ उपाध्याय के मुख्यमंत्रीत्व में एक पृथक मंत्रिमंडल का गठन हुआ, जिसने प्रशासनिक दृष्टि से छोटे राज्यों की वकालत करते हुए विलय का विरोध किया। किंतु राज्य पुनर्गठन आयोग (फजल अली आयोग) ने अजमेर के नेताओं के पृथक अस्तित्व के तर्कों को खारिज कर दिया और इसे भौगोलिक व सांस्कृतिक दृष्टि से राजस्थान का अभिन्न अंग माना। आयोग की सिफारिश पर 1 नवंबर 1956 को अजमेर-मेरवाड़ा का औपचारिक रूप से राजस्थान में पूर्ण विलय कर दिया गया।
उत्तर: 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में राजस्थान का सामाजिक ढांचा रूढ़िवादी कुप्रथाओं (सती प्रथा, कन्या-वध, डाकन प्रथा, दास प्रथा, बाल विवाह) से ग्रसित था। ब्रिटिश प्रशासनिक दबाव, पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार और स्थानीय समाज सुधारकों के प्रयासों के चलते इन कुरीतियों पर प्रतिबंध हेतु विधायी प्रयास किए गए:
सती प्रथा उन्मूलन: ब्रिटिश दबाव में सर्वप्रथम 1822 ई. में बूंदी रियासत ने इसे गैर-कानूनी घोषित किया, जिसके बाद अन्य रियासतों ने भी कानून बनाए।
कन्या वध पर रोक: दहेज और 'त्याग प्रथा' के कारण प्रचलित इस कुप्रथा को सर्वप्रथम 1834 ई. में कोटा राज्य ने प्रतिबंधित किया।
त्याग प्रथा निवारण: जोधपुर (1841 ई.) और अन्य राज्यों ने ब्रिटिश सहयोग से नियम बनाकर चारण-भाटों को दी जाने वाली मुंहमांगी दक्षिणा को सीमित किया।
डाकन प्रथा: भील-मीणा जनजातियों में अंधविश्वास के कारण प्रचलित इस प्रथा को 1853 ई. में मेवाड़ भील कोर के प्रयासों से उदयपुर राज्य ने गैर-कानूनी घोषित किया।
मानव व्यापार व दास प्रथा: कोटा-बूंदी ने 1832 ई. में दास प्रथा और जयपुर ने 1847 ई. में मानव व्यापार पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया।
संस्थागत प्रयास: बाल विवाह व अन्य कुरीतियों को रोकने के लिए 'देश हितैषिणी सभा' (1877) और 'वाल्टर कृत राजपूत हितकारिणी सभा' (1889) जैसी संस्थाओं ने विवाह की आयु निर्धारित करने और खर्च सीमित करने में सराहनीय भूमिका निभाई।
Specially thanks to Questions Authors - P K Nagauri, तिलोकाराम जी
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