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राजस्थान का इतिहास: प्रागैतिहासिक काल से 18वीं शताब्दी तक

राजस्थान का इतिहास: प्रागैतिहासिक काल से 18वीं शताब्दी तक

यह संकलन UPSC सिविल सेवा मुख्य परीक्षा (Syllabus: भारतीय संस्कृति के प्रमुख पक्ष, प्रादेशिक इतिहास के प्रभाव) तथा RAS मुख्य परीक्षा (Syllabus: इकाई-1, राजस्थान का इतिहास, कला, संस्कृति, साहित्य एवं परंपरा) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। 'प्रागैतिहासिक काल से 18वीं शताब्दी के अवसान तक राजस्थान का इतिहास' एक ऐसा केंद्रीय खंड है जिससे हर वर्ष अतिलघुत्तरात्मक (20 शब्द), लघुत्तरात्मक (50 शब्द) और निबंधात्मक (100 शब्द) प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं। यह ब्लॉग पोस्ट न केवल परीक्षा के दृष्टिकोण से मुख्य राजवंशों, अभिलेखों और स्थापत्य के अंतर्संबंधों को स्पष्ट करती है, बल्कि प्रामाणिक और मानक उत्तर लेखन शैली (Standard Answer Writing Structure) का सटीक खाका भी प्रस्तुत करती है।

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अतिलघुत्तरात्मक प्रश्न

प्र 1. बागौर सभ्यता (भीलवाड़ा) के बारे में बताइए।

उत्तर: भीलवाड़ा में कोठारी नदी के तट पर स्थित यह महासती टीले के रूप में प्रसिद्ध मध्यपाषाणकालीन व नवपाषाणकालीन स्थल है। यहाँ से भारत में पशुपालन और कृषि के प्राचीनतम साक्ष्य तथा भारी मात्रा में पाषाण उपकरण (माइक्रोलिथ) प्राप्त हुए हैं।

प्र 2. रणकपुर प्रशस्ति का ऐतिहासिक महत्व क्या है?

उत्तर: सूत्रधार देपाक द्वारा 1439 ई. में रचित इस प्रशस्ति में बप्पा रावल और कालभोज को अलग-अलग व्यक्ति बताया गया है। इससे मेवाड़ के गुहिल वंश (विशेषकर महाराणा कुंभा की प्रारंभिक विजयों और उपलब्धियों) की प्रामाणिक जानकारी मिलती है।

प्र 3. चंपानेर समझौता (1456 ई.) क्या था?

उत्तर: महाराणा कुंभा की बढ़ती शक्ति को नियंत्रित करने के लिए मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी और गुजरात के कुतुबुद्दीन के मध्य हुआ एक सैन्य गठबंधन था। इसका उद्देश्य मेवाड़ को जीतकर आपस में बांटना था, किंतु कुंभा ने इस कूटनीति को विफल कर दिया।

प्र 4. खानवा युद्ध (1527 ई.) के दूरगामी परिणाम क्या हुए?

उत्तर: 17 मार्च 1527 को राणा सांगा और बाबर के मध्य हुए इस युद्ध में बाबर के तोपखाने (तुलुगमा पद्धति) और सलहदी तंवर के विश्वासघात के कारण राजपूत पराजित हुए। इसके परिणामस्वरूप भारत में मुगल साम्राज्य सुदृढ़ हुआ। यह अंतिम अवसर था जब सभी राजपूत राजा एक छत्र के नीचे लड़े।

प्र 5. सपादलक्ष से आप क्या समझते हैं?

उत्तर: बिजौलिया शिलालेख के अनुसार यह सांभर (जयपुर-अजमेर क्षेत्र) का प्राचीन नाम था। यहाँ 551 ई. में वासुदेव चहमान ने चौहान राजवंश की स्थापना की, अहिच्छत्रपुर (नागौर) को राजधानी बनाया और सांभर झील का निर्माण करवाया।

प्र 6. नागभट्ट प्रथम के 'नागावलोक दरबार' का क्या महत्व है?

उत्तर: यह 8वीं सदी के गुर्जर-प्रतिहार शासक नागभट्ट प्रथम का दरबार था, जो उसकी साम्राज्यवादी संप्रभुता का प्रतीक था। इसमें समकालीन राजपूत वंश (गुहिल, चौहान, परमार, चालुक्य आदि) उसके सामंत/अधीनस्थ की हैसियत से उपस्थित होते थे, जिससे अरब आक्रमणों को रोकने में मदद मिली।

लघुत्तरात्मक प्रश्न

प्र 7. बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) के ऐतिहासिक महत्व की विवेचना कीजिए।

उत्तर: गुणभद्र द्वारा संस्कृत भाषा में रचित यह अभिलेख तत्कालीन शाकंभरी के चौहानों के इतिहास, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक दशा का प्रामाणिक स्रोत है।

  • प्रमुख बिंदु: इसके अनुसार चौहानों के आदिपुरुष वासुदेव चौहान 'वत्सगोत्रीय ब्राह्मण' थे, जिन्होंने सांभर झील का निर्माण करवाया।
  • भौगोलिक साक्ष्य: इसमें राजस्थान के प्राचीन नगरों के नामों का उल्लेख है; जैसे—जाबालिपुर (जालौर), शाकंभरी (सांभर), श्रीमाल (भीनमाल) और अहिच्छत्रपुर (नागौर)।
  • साहित्यिक विशेषता: लेखक ने इस प्रशस्ति में अनुप्रास, श्लेष और विरोधाभास अलंकारों का उत्कृष्ट प्रयोग कर अपनी विद्वता प्रदर्शित की है।

प्र 8. महाराणा कुंभा का दुर्ग स्थापत्य में योगदान रेखांकित कीजिए।

उत्तर: महाराणा कुंभा ने परंपरागत दुर्ग शैली में सामरिक सुरक्षा, कूटनीति और भौगोलिक स्थिति का समन्वय कर 'मेवाड़ स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर' को विकसित किया।

निर्माण व जीर्णोद्धार: कविराजा श्यामलदास (वीर विनोद) के अनुसार मेवाड़ के 84 दुर्गों में से 32 दुर्गों का निर्माण कुंभा ने करवाया। इनमें कुंभलगढ़ (गौरव गाथा का प्रतीक), अचलगढ़, बसंतीगढ़ और मचानगढ़ प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त चित्तौड़गढ़ जैसे प्राचीन दुर्गों का जीर्णोद्धार कराया।

विशेषताएं: दुर्गों के भीतर सादगीपूर्ण शाही आवास, सैन्य बैरक, आत्मनिर्भर कृषि भूमि, उन्नत जल प्रबंधन (बावड़ियाँ/कुंड), मंदिर और अन्न भंडार सुरक्षात्मक दृष्टि से निर्मित थे।

प्र 9. वीर दुर्गादास राठौड़ का मारवाड़ के इतिहास में स्थान निर्धारित कीजिए।

उत्तर: स्वामी भक्त वीर शिरोमणि दुर्गादास महाराजा जसवंत सिंह के मंत्री आसकरण के पुत्र थे। वीर दुर्गादास मारवाड़ के इतिहास में 'राजपूती चेतना', कूटनीति और निस्वार्थ स्वामीभक्ति के सर्वोच्च प्रतीक हैं।

  • राठौड़-सिसोदिया संघ: महाराजा जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद औरंगजेब की हड़प नीति के विरुद्ध अजीत सिंह को सुरक्षित निकाल कर जोधपुर की स्वतंत्रता के लिए जीवनपर्यंत संघर्ष किया।
  • धार्मिक सहिष्णुता व कूटनीति: औरंगजेब के विद्रोही पुत्र शहजादा अकबर को शरण दी तथा उसके पुत्र-पुत्री (बुलंद अख्तर व सफीयतुन्निसा) को इस्लामोचित शिक्षा देकर उत्कृष्ट मानवीय गरिमा और सहिष्णुता का परिचय दिया।
  • त्याग: अजीत सिंह से अनबन होने पर वे बिना किसी प्रतिशोध के मेवाड़ चले गए। मारवाड़ में आज भी उक्ति प्रसिद्ध है—"मायड़ ऐसा पूत जण जैसा दुर्गादास"।

प्र 10. राजकुमारी चारुमति विवाह विवाद क्या था? इसका राजनीतिक परिणाम क्या निकला?

उत्तर: यह विवाह विवाद 17वीं सदी में मुगल-राजपूत संबंधों में बढ़ते वैमनस्य और राजपूत स्वाभिमान का जीवंत उदाहरण था।

  • समस्या: किशनगढ़ के राजा मानसिंह ने अपनी बहन चारुमति का विवाह राजनीतिक दबाव में औरंगजेब से तय किया था। चारुमति ने इसे धर्म और संस्कृति के विरुद्ध मानकर औरंगजेब के 'डोले' का विरोध किया और मेवाड़ के महाराणा राजसिंह से सहायता मांगी।
  • समाधान व परिणाम: औरंगजेब की नाराजगी की परवाह न करते हुए महाराणा राजसिंह ने कूटनीतिक व सैन्य बल पर चारुमति से विवाह किया। इसके परिणामस्वरूप औरंगजेब ने प्रतिशोध स्वरूप मेवाड़ के कई परगने छीन लिए और मुगल-मेवाड़ संघर्ष पुनः तीव्र हो गया।

निबंधात्मक प्रश्न

प्र 11. "सवाई जयसिंह एक कुशल शासक ही नहीं, बल्कि एक प्रगतिशील समाज सुधारक के रूप में हमेशा अग्रणी शासकों की पंक्ति में खड़े रहेंगे।" विवेचना कीजिए।

उत्तर: जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय मध्यकालीन भारत के उन गिने-चुने शासकों में से थे, जिन्होंने रूढ़िवादी सामाजिक विसंगतियों को पहचानकर वैधानिक सुधारों का मार्ग प्रशस्त किया। समाज सुधारक के रूप में उनका योगदान बहुआयामी रहा:

  1. महिला अधिकार एवं सशक्तिकरण: वे पहले राजपूत हिंदू शासक थे जिन्होंने सती प्रथा के उन्मूलन का पुरजोर प्रयास किया। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह को वैधता प्रदान करने के लिए नियम बनाए और कोटा-जयपुर अभिलेखों के अनुसार असहाय विधवाओं के लिए सहायतार्थ शुल्क/पेंशन की व्यवस्था की। महाराणा रायमल की भांति उन्होंने भी विधवाओं के भरण-पोषण के अधिकारों को सुरक्षित किया।

  2. कुरीतियों पर प्रहार: राजपूत समाज में विवाह के अवसर पर होने वाले अत्यधिक अपव्यय (टीका प्रथा/दहेज) और फिजूलखर्ची पर रोक लगाने के लिए नियम बनाए। उन्होंने अंतर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहित करने का ऐतिहासिक प्रयास किया।

  3. धार्मिक व नैतिक सुधार: साधु-संतों और वैरागियों में बढ़ते सामाजिक व्यभिचार को रोकने के लिए उन्होंने कड़े नियम बनाए। वैरागियों के लिए अस्त्र-शस्त्र रखने और संपत्ति जमा करने पर रोक लगाई तथा उन्हें गृहस्थ जीवन अपनाने के लिए प्रेरित किया। उनके लिए मथुरा में 'वैराग्यपुरा' नामक अलग बस्ती बसाई।

  4. सामाजिक समरसता व शिक्षा: ब्राह्मणों की आंतरिक उपजातियों के भेदभाव को कम करने के लिए उन्होंने छह उपजातियों को एक साथ बैठकर भोजन करने के लिए सहमत किया, जो 'छन्यात ब्राह्मण' कहलाए। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने संस्कृत भाषा के प्रचार और खगोल विज्ञान के विकास के लिए व्यापक कार्य किए। इसके साथ ही कुएं, धर्मशालाएं और अनाथालय बनवाकर जनहितकारी राज्य की अवधारणा को पुष्ट किया।

निष्कर्ष: सवाई जयसिंह केवल युद्धों और वेधशालाओं (जंतर-मंतर) तक सीमित नहीं थे, बल्कि उनके ये सामाजिक सुधार मध्यकाल में एक आधुनिक और समतामूलक समाज के निर्माण के शुरुआती कदम थे।

प्र 12. राजपूतों की उत्पत्ति के विषय में विभिन्न ऐतिहासिक मतों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।

उत्तर: प्राचीन क्षत्रियों के स्थान पर मध्यकाल में 'राजपूत' नामक एक नए सामाजिक-राजनीतिक वर्ग का उदय हुआ, जिसकी उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों में गहरा मतभेद है। प्रमुख मत निम्नलिखित हैं:

  1. अग्निकुंड का सिद्धांत (पौराणिक मत): चंदबरदाई रचित 'पृथ्वीराज रासो' के अनुसार, आबू पर्वत पर वशिष्ठ मुनि द्वारा रचित यज्ञ कुंड से राक्षसों (विदेशी आक्रमणकारियों) के विनाश हेतु चार राजपूत योद्धाओं—परमार, प्रतिहार, चालुक्य और चौहान की उत्पत्ति हुई। मुँहणौत नैणसी और सूर्यमल मिश्रण ने भी इस मत का समर्थन किया, परंतु आधुनिक वैज्ञानिक युग में इसे केवल एक रूपक (Metaphor) माना जाता है, जो शुद्धिकरण की प्रक्रिया को दर्शाता है।

  2. सूर्यवंशी एवं चंद्रवंशी सिद्धांत (देशी उत्पत्ति): इतिहासकार डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा और सी. वी. वैद्य ने अनेक साहित्यिक एवं अभिलेखीय प्रमाणों के आधार पर राजपूतों को प्राचीन वैदिक क्षत्रियों की संतान तथा सूर्यवंशी/चंद्रवंशी सिद्ध किया है।

  3. विदेशी उत्पत्ति का सिद्धांत: विदेशी विद्वान कर्नल जेम्स टॉड और स्मिथ ने राजपूतों को सीथियन, शक, हुण और कुषाण जैसी विदेशी जातियों की संतान माना है, क्योंकि राजपूतों के रीति-रिवाज (जैसे- शस्त्र पूजा, सती प्रथा, सुरापान) इन विदेशी जातियों से मिलते थे। डॉ. डी. आर. भंडारकर ने गुर्जरों को विदेशी मानते हुए राजपूतों को गुर्जर जाति से उत्पन्न माना और इस मत को बल दिया।

  4. ब्राह्मण वंशीय सिद्धांत: डॉ. भंडारकर ने बिजौलिया शिलालेख के आधार पर (जहाँ चौहानों को 'वत्सगोत्रीय ब्राह्मण' कहा गया है) कुछ राजपूतों को ब्राह्मण वंशीय माना है, हालांकि ओझा जी ने इस मत का खंडन किया है।

निष्कर्ष: आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार राजपूतों की उत्पत्ति किसी एक स्रोत से नहीं बल्कि एक मिश्रित सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रिया का परिणाम थी। भारत में आई विदेशी जातियां यहाँ की युद्धोपजीवी जातियों में विलीन हो गईं। प्राचीन क्षत्रियों के अवशेष और सत्ताधारी वर्ग होने के कारण उन्हें 'राजपुत्र' कहा जाने लगा, जो कालांतर में अपभ्रंश होकर 'राजपूत' नाम से प्रतिष्ठित हुए।

Specially thanks to Post Authors -  P K Nagauri, तिलोकाराम जी

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