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राजस्थान की जनजातियाँ: भील, मीणा एवं गरासिया | RAS/UPSC Mains Q&A

राजस्थान की जनजातियाँ: भील, मीणा एवं गरासिया | RAS/UPSC Mains Q&A

यदि आप RAS Mains (Paper-1 Unit-1 & Paper-3), UPSC Civil Services (GS Paper-1 Culture & Society) या RPSC Senior Teacher / Assistant Professor जैसी मुख्य परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, तो राजस्थान के जनजातीय समाज (भील, मीणा, गरासिया) का सामाजिक-सांस्कृतिक ढांचा एक अत्यंत महत्वपूर्ण खंड है। मुख्य परीक्षा में अंक केवल तथ्य लिखने से नहीं, बल्कि शब्द सीमा के भीतर विश्लेषणात्मक व सटीक प्रस्तुतिकरण से मिलते हैं। इस पोस्ट में आपको RAS एवं UPSC Mains परीक्षा के पैटर्न पर आधारित 50–60 शब्द (लघूतरात्मक) तथा 100–150 शब्द (निबंधात्मक) के अद्यतन एवं मॉडल उत्तर मिलेंगे। अपनी उत्तर लेखन शैली (Answer Writing) को धार दें और सफलता सुनिश्चित करें!

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भाग A: लघूतरात्मक प्रश्न (शब्द सीमा: 50–60 शब्द)

प्रश्न 1: भील जनजाति में 'मानगढ़ धाम' का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: मानगढ़ धाम (बांसवाड़ा) भील जनजाति का प्रमुख ऐतिहासिक स्थल है। यहाँ 17 नवंबर 1913 को स्वामी गोविंद गुरु के नेतृत्व में चल रहे 'भगत आंदोलन' के दौरान ब्रिटिश सेना ने लगभग 1500 भीलों की नृशंस हत्या कर दी थी। इसे "राजस्थान का जलियांवाला बाग" कहा जाता है। वर्तमान में यह स्थल भील समुदाय की सामाजिक चेतना, बलिदान तथा सांस्कृतिक आस्था के केंद्र के रूप में प्रसिद्ध है।

प्रश्न 2: 'वालरा कृषि' क्या है? यह राजस्थान की किन जनजातियों से संबंधित है तथा इसके पर्यावरणीय प्रभाव लिखिए।

उत्तर: 'वालरा' राजस्थान की भील एवं गरासिया जनजातियों द्वारा पहाड़ी तथा मैदानी क्षेत्रों में की जाने वाली स्थानांतरित (झूम) कृषि का स्थानीय रूप है। पहाड़ी ढलानों की वालरा को 'चीमाता' एवं मैदानी भागों की वालरा को 'धजिया' कहते हैं।

पर्यावरणीय प्रभाव: इससे वनों का विनाश होता है, मृदा अपरदन बढ़ता है तथा जैव विविधता एवं पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर क्षति पहुँचती है।

प्रश्न 3: मीणा जनजाति के सामाजिक विभाजन (ज़मींदार एवं चौकीदार) पर टिप्पणी कीजिए।

उत्तर: मीणा जनजाति ऐतिहासिक रूप से दो मुख्य वर्गों में विभाजित रही है:

  1. ज़मींदार मीणा: यह वर्ग मुख्य रूप से कृषि, पशुपालन एवं स्थायी आजीविका से जुड़ा रहा है।
  2. चौकीदार मीणा: यह वर्ग मध्यकाल में राजाओं के महलों, किलों तथा गाँवों की सुरक्षा एवं चौकीदारी का कार्य करता था।

वर्तमान में आधुनिक शिक्षा एवं आरक्षण के लाभ से यह सामाजिक विभाजन समाप्तप्राय है और यह समुदाय राज्य का सबसे सशक्त जनजातीय वर्ग बन चुका है।

प्रश्न 4: गरासिया जनजाति की विवाह पद्धतियों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।

उत्तर: गरासिया समाज पितृसत्तात्मक होता है, जो गोत्रों व अटकों में विभाजित है। इनकी सामाजिक संरचना में गाँव की सबसे छोटी इकाई 'फालिया' (एक ही गोत्र का समूह) है तथा पूरा समाज 'भील गरासिया' व 'गमेती गरासिया' में बंटा है।

गरासिया जनजाति में विवाह के अनोखे रूप प्रचलित हैं:

  1. मोर बांधिया: यह ब्रह्म विवाह के समान एक औपचारिक एवं सर्वमान्य विवाह है।
  2. ताणना विवाह: इसमें वर पक्ष द्वारा कन्या पक्ष को 'दापा' (कन्या मूल्य) देकर विवाह किया जाता है।
  3. मेवकी/सेवाना विवाह: यह आपसी सहमति या भगाकर ले जाने की प्रथा से जुड़ा रूप है।

इस जनजाति में 'नाता प्रथा' तथा बिना विवाह साथ रहने (लिव-इन) की सामाजिक स्वीकार्यता भी पाई जाती है।

प्रश्न 5: 'गवरी/राई' लोकनाट्य क्या है? इसकी मुख्य विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

उत्तर: 'गवरी' (या राई) मेवाड़ क्षेत्र की भील जनजाति द्वारा भाद्रपद-आश्विन माह में 40 दिनों तक खेला जाने वाला पारंपरिक धार्मिक लोकनाट्य है।

विशेषताएँ: यह केवल पुरुषों द्वारा खेला जाता है और भगवान शिव (बूढ़िया) तथा माता पार्वती (गवरी) की कथाओं पर आधारित होता है। इसमें मांदल और झांझ वाद्यों का प्रयोग होता है। यह राजस्थान का सबसे प्राचीन लोकनाट्य (राई नाट्य) माना जाता है।

प्रश्न 6: गरासिया जनजाति में 'हेल्रू' एवं 'भाकरी' का क्या महत्व है?

उत्तर: हेल्रू: 'हेल्रू' (Helru) गरासिया जनजाति की एक प्रमुख पारंपरिक सामाजिक व सहकारी संस्था है। गरासिया बहुल क्षेत्रों में समाज का प्रत्येक परिवार (स्त्री या पुरुष) इस संस्था का अनिवार्य सदस्य होता है। यह संस्था समुदाय में परस्पर सहयोग, आर्थिक विकास, कृषि सहायता, श्रमदान एवं सांस्कृतिक मूल्यों व धरोहर के संरक्षण हेतु सामूहिक मंच के रूप में कार्य करती है।

भाकरी: गरासिया जनजाति द्वारा प्रयुक्त वह भूमि या अनाज संग्रहण का ढांचा है जो सामूहिक कृषि एवं सामाजिक सहकारिता का प्रतीक है। ये दोनों संस्थान समुदाय में परस्पर सहयोग और सामाजिक समरसता बनाए रखने में सहायक हैं।

प्रश्न 7: राजस्थान की जनजातियों में प्रचलित 'छेड़ा फाड़ना' की प्रथा क्या है?

उत्तर: 'छेड़ा फाड़ना' मुख्यतः भील एवं गरासिया जनजातियों में प्रचलित सामाजिक विवाह-विच्छेद (तालाक) की एक वैधानिक प्रक्रिया है। इसमें पति, पंचों की उपस्थिति में अपनी पत्नी की साड़ी या दुपट्टे के पल्लू (छेड़ा) का टुकड़ा फाड़कर उसमें सिक्का बांधकर महिला को सौंप देता है। इसके पश्चात महिला को समाज में पुनः नया जीवनसाथी चुनने (नाता जाने) का अधिकार मिल जाता है।

प्रश्न 8: जनजातीय समाज में 'झगड़ा' (झगड़ा राशि) से क्या अभिप्राय है?

उत्तर: 'झगड़ा' मुख्य रूप से मीणा एवं भील जनजातियों में प्रचलित एक पारंपरिक सामाजिक दंड या मुआवजा प्रणाली है। यदि कोई पुरुष किसी अन्य व्यक्ति की विवाहिता को भगाकर ले जाता है, तो गाँव की पारंपरिक पंचायत पीड़ित पति को क्षतिपूर्ति के रूप में दोषी पुरुष से एक निश्चित धनराशि ('झगड़ा राशि') वसूल करके दिलाती है, जिससे विवाद का शांतिपूर्ण निपटारा होता है।

प्रश्न 9: राजस्थान के जनजातीय समाज में 'नाता प्रथा' को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: 'नाता प्रथा' राजस्थान की भील, मीणा, गरासिया आदि जनजातियों में प्रचलित एक सामाजिक रूप से स्वीकृत पुनर्विवाह/सहजीवन परंपरा है। इसके तहत कोई विवाहिता स्त्री अपने पूर्व पति को छोड़कर (या विधवा/परित्यक्ता होने पर) आपसी सहमति से किसी अन्य पुरुष के साथ बिना किसी औपचारिक विवाह समारोह के पत्नी के रूप में रह सकती है। इसमें नए पति को पूर्व पति को 'दापा' या 'झगड़ा' राशि देनी होती है।

प्रश्न 10: भील जनजाति में 'दापा प्रथा' से क्या तात्पर्य है?

उत्तर: 'दापा' (Dapa) भील एवं गरासिया जनजातियों में प्रचलित 'कन्या मूल्य' (Bride Price) की एक सामाजिक प्रथा है। इसमें विवाह तय होने पर वर पक्ष द्वारा कन्या के पिता या परिवार को आर्थिक/वस्तु रूप में निश्चित धनराशि (दापा) दी जाती है। इसका उद्देश्य कन्या के निष्कासन से उसके परिवार को होने वाली आर्थिक व श्रम क्षति की पूर्ति करना होता है।

भाग B: निबंधात्मक प्रश्न (शब्द सीमा: 100–150 शब्द)

प्रश्न 11: राजस्थान की भील जनजाति की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक विशेषताओं का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।

उत्तर: भील जनजाति राजस्थान की दूसरी सबसे बड़ी तथा अत्यंत प्राचीन जनजाति है, जो मुख्य रूप से मेवाड़ व वागड़ (उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर) के पहाड़ी व मैदानी क्षेत्रों में निवास करती है।

  • सामाजिक संरचना: भील समाज पितृसत्तात्मक होता है। इनके बिखरे हुए घरों को 'कू' (टापरा) तथा कई घरों के समूह को 'पाल' कहते हैं, जिसका मुखिया 'गमेती' कहलाता है। समाज में अंतर्विवाह, नाता प्रथा, दापा प्रथा एवं बहुपत्नी विवाह स्वीकृत हैं। पहनावे के आधार पर इन्हें 'लंगोटिया' व 'पोतीदा' भील में बांटा जाता है। होली इनका प्रमुख त्योहार है, जिस पर 'गवरी' लोकनाट्य का आयोजन होता है।
  • सांस्कृतिक विशेषताएं: भील संस्कृति कला और लोकनृत्यों से समृद्ध है। 'घूमर', 'गैर', 'गवरी' एवं 'नेजा' इनके प्रमुख नृत्य हैं। बेणेश्वर धाम (डूंगरपुर) इनका 'कुंभ' कहलाता है। केसरियानाथ एवं पाबूजी इनके पूज्य देव हैं।
  • आर्थिक परिदृश्य: पारंपरिक रूप से ये वालरा कृषि, शिकार एवं वनोपज संग्रहण पर निर्भर रहे हैं। वर्तमान में भूमि की कमी एवं वनों पर प्रतिबंधों के कारण यह समुदाय कृषि मजदूरी एवं मौसमी प्रवास (Migration) के चक्र में फँसा हुआ है।

निष्कर्ष: गोविंद गुरु के 'भगत आंदोलन' और मोतीलाल तेजावत के 'एकी आंदोलन' ने इनमें सामाजिक चेतना जगाई। यद्यपि शिक्षा का प्रसार बढ़ा है, तथापि कुपोषण, बेरोजगारी और पलायन आज भी इनके विकास में मुख्य बाधाएं हैं।

प्रश्न 12: मीणा जनजाति के सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण में शिक्षा, राजनीतिक भागीदारी तथा संवैधानिक प्रावधानों की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर: मीणा जनजाति राजस्थान की सबसे बड़ी (जयपुर, दोसा, सवाई माधोपुर में सघन) और सामाजिक-आर्थिक रूप से सबसे अधिक विकसित जनजाति है। इसका उल्लेख पुराणों (मत्स्य अवतार) एवं मध्यकालीन इतिहास में मिलता है।

सशक्तिकरण के कारक:

  1. संवैधानिक प्रावधान एवं आरक्षण: स्वतंत्रता के पश्चात अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा मिलने से इस समुदाय ने सरकारी सेवाओं और उच्च शिक्षा में आरक्षण का अधिकतम लाभ उठाया।
  2. शिक्षा का प्रसार: 1944 के 'मीणा क्षेत्रीय सभा' आंदोलन के बाद सामाजिक कुरीतियों (जैसे- जयराम पेशा कानून) का अंत हुआ और शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी।
  3. राजनीतिक चेतना: पंचायत स्तर से लेकर विधानसभा एवं संसद तक इस समुदाय का राजनीतिक प्रतिनिधित्व अत्यंत प्रभावशाली रहा है।

सामाजिक गतिशीलता: मीणा समाज ने अपनी पारंपरिक संरचना (चौरासी पंचायत) को बनाए रखते हुए आधुनिकता को अपनाया है। कृषि में आधुनिक तकनीकों के प्रयोग से इनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई है।

निष्कर्ष: मीणा जनजाति अन्य जनजातियों के लिए विकास का एक मॉडल पेश करती है। हालाँकि, इस समुदाय के भीतर शहरी और ग्रामीण वर्गों के बीच बढ़ता अंतर (Intra-tribe inequality) एक नई चुनौती के रूप में उभर रहा है।

प्रश्न 13: गरासिया जनजाति की अनूठी सांस्कृतिक परंपराओं का वर्णन करते हुए उनकी वर्तमान सामाजिक-आर्थिक समस्याओं पर चर्चा कीजिए।

उत्तर: गरासिया जनजाति राजस्थान की तीसरी सबसे बड़ी जनजाति है, जो मुख्य रूप से सिरोही (आबू रोड), पाली तथा उदयपुर के पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करती है।

सांस्कृतिक विशेषताएं:

  • अनूठी विवाह एवं जीवनशैली: इनमें 'दापा प्रथा' और विवाह पूर्व सहजीवन (लिव-इन) की सामाजिक मान्यता है। मोर बांधिया, ताणना एवं सेवाना इनके मुख्य विवाह रूप हैं।
  • लोक कला एवं मेले: 'वालर' (बिना वाद्ययंत्र के किया जाने वाला नृत्य), 'कूद' तथा 'लूर' इनके प्रसिद्ध नृत्य हैं। सिरोही का 'चित्र-विचित्र मेला' और 'मनखारो मेला' इनकी सांस्कृतिक धरोहर हैं। ये नक्की झील को पवित्र मानकर अस्थि विसर्जन करते हैं।

सामाजिक-आर्थिक समस्याएं:

  1. भौगोलिक पृथक्करण: दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में रहने के कारण स्वास्थ्य, पेयजल और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव है।
  2. आर्थिक पिछड़ापन: जोत का छोटा आकार, पारंपरिक खेती और वनों पर अत्यधिक निर्भरता इनकी गरीबी का मुख्य कारण है।
  3. पलायन एवं कुरीतियां: रोजगार हेतु पड़ोसी राज्य गुजरात की ओर मौसमी पलायन तथा 'दापा प्रथा' के कारण बढ़ता आर्थिक बोझ चिंताजनक है।

निष्कर्ष: 'हेल्रू' जैसी पारंपरिक विकास संस्थाओं का आधुनिक कल्याणकारी योजनाओं के साथ एकीकरण करके ही गरासिया समुदाय का स्थायी विकास संभव है।

प्रश्न 14: राजस्थान की जनजातीय कार्य योजनाओं (जैसे- TAD, TSP) के बावजूद जनजातीय क्षेत्रों में अपेक्षित सुधार न होने के कारणों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

उत्तर: राजस्थान सरकार ने जनजातियों के सर्वांगीण विकास हेतु जनजातीय क्षेत्रीय विकास विभाग (TAD) तथा जनजातीय उप-योजना (TSP) लागू की है। इसके बावजूद भील और गरासिया जैसे समुदायों में अभी भी अपेक्षित सुधार नहीं दिखते।

विफलता/धीमी प्रगति के प्रमुख कारण:

  1. कार्यान्वयन में कमियां: बजटीय आवंटन का समय पर उपयोग न होना और योजनाओं का धरातल पर सही ढंग से लागू न होना।
  2. विषम भौगोलिक स्थितियाँ: दक्षिणी राजस्थान के बिखरे हुए ढाणी/टापरा ढाँचे के कारण अवसंरचना (सड़क, बिजली, स्कूल) का विस्तार खर्चीला और जटिल है।
  3. बिचौलिये एवं भ्रष्टाचार: स्थानीय स्वशासन (पेसा अधिनियम - PESA Act, 1996) का प्रभावी ढंग से लागू न हो पाना, जिससे जनजातियों को वनों एवं संसाधनों पर अधिकार नहीं मिल सका।
  4. शिक्षा व स्वास्थ्य का निम्न स्तर: भील एवं गरासिया बहुल क्षेत्रों में ड्रॉप-आउट दर और कुपोषण की दर अब भी चिंताजनक है।

भावी राह: PESA अधिनियम को सख्ती से लागू करना, स्थानीय जनजातीय भाषाओं में प्राथमिक शिक्षा देना, और 'वन धन योजना' के माध्यम से मूल्य संवर्धन (Value Addition) को बढ़ावा देना ही वास्तविक सशक्तिकरण का मार्ग है।

प्रश्न 15: मीणा जनजाति की सामाजिक संरचना तथा इसके अंतर्गत पाए जाने वाले विभिन्न सामाजिक समूहों का विस्तृत वर्णन कीजिए।

उत्तर: मीणा जनजाति राजस्थान की सबसे बड़ी एवं सामाजिक-आर्थिक रूप से विकसित जनजाति है। ऐतिहासिक एवं व्यावसायिक आधार पर इनका समाज मुख्यतः दो प्रमुख उपजातियों—ज़मींदार मीणा (कृषक व पशुपालक) तथा चौकीदार मीणा (सुरक्षाकर्मी)—में विभाजित रहा है।

इसके अतिरिक्त, भौगोलिक व सांस्कृतिक भिन्नताओं के आधार पर मीणा समाज कई विशिष्ट सामाजिक समूहों में बंटा हुआ है:

  • आदि मीणा: इन्हें अमिश्रित एवं मूल वंशज माना जाता है।
  • प्रतिहार मीणा: टोंक, भीलवाड़ा व कोटा-बूंदी क्षेत्र में केंद्रित समूह।
  • भील मीणा: मेवाड़ व वागड़ क्षेत्र में भील एवं मीणा जनजातियों के रक्त-मिश्रण से उत्पन्न समूह।
  • सुरतेवाल मीणा: अन्य जातियों से वैवाहिक संबंधों के परिणामस्वरूप उत्पन्न वर्ग।
  • अन्य समूह: मारवाड़ के 'चौथिया मीणा', गोड़वाड़ क्षेत्र के 'ठेढ़िया मीणा', तथा 'चमरिया' व 'रावत मीणा'।

निष्कर्ष: यद्यपि मध्यकाल में इन समूहों में विविधता थी, परंतु आधुनिक शिक्षा, संवैधानिक आरक्षण (ST दर्जा) तथा राजनीतिक जागरूकता के कारण यह समुदाय आज एकजुट होकर राज्य के सबसे सशक्त वर्ग के रूप में उभर चुका है।

 

विशेष आभार (Special Thanks): इस प्रश्नोत्तरी/सामग्री को तैयार करने में अपना अमूल्य योगदान देने वाले सम्मानित लेखकगण — श्री पी. के. नागौरी, श्री दिनेश मीना एवं  SGGP Team का हम सहृदय धन्यवाद करते हैं। 

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