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18वीं शताब्दी में राजस्थान की प्रशासनिक एवं राजस्व व्यवस्था | RAS Mains

18वीं शताब्दी में राजस्थान की प्रशासनिक एवं राजस्व व्यवस्था | RAS Mains

RPSC RAS Mains (Paper-1, History) और UPSC Mains (G.S. Paper-1) की परीक्षाओं में राजस्थान के मध्यकालीन एवं आधुनिक संक्रमण कालीन इतिहास से जुड़े प्रशासनिक व राजस्व ढाँचे पर हर वर्ष सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं। 18वीं शताब्दी का अंत राजस्थान के इतिहास में एक ऐसा महत्वपूर्ण कालखंड है, जहाँ मुगल प्रभाव के अवसान और ब्रिटिश प्रभुत्व की शुरुआत के बीच राजपूत राज्यों की पारंपरिक प्रशासनिक एवं वित्तीय व्यवस्था में व्यापक बदलाव आए। मुख्य परीक्षा में सफलता केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि सटीक उत्तर लेखन शैली और तकनीकी शब्दावली के सही उपयोग से मिलती है। अभ्यर्थियों की इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, यह विशेष "Mains Answer Writing Practice" सत्र तैयार किया गया है, जिसमें मानक शब्द सीमा के भीतर उच्च अंकदायी (High-Scoring) मॉडल उत्तर प्रस्तुत किए गए हैं।

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भाग अ: लघूतरात्मक प्रश्न (शब्द सीमा: 50-60 शब्द)

प्रश्न 1: मध्यकालीन राजस्थान में 'जागीरदारी प्रथा' के स्वरूप को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: राजस्थान की जागीरदारी व्यवस्था यूरोपीय सामंतवाद या मुगल मनसबदारी से भिन्न, पूर्णतः रक्त संबंधों, कुल (Clan) की भावना और 'भाई-बंट' के सिद्धांत पर आधारित थी। यहाँ जागीरदार स्वयं को राजा का नौकर न मानकर राज्य की भूमि का सह-स्वामी मानते थे। राजा को 'अपने वर्ग में प्रथम' (First among equals) माना जाता था। यह व्यवस्था सैन्य सुरक्षा और क्षेत्रीय शासन के विकेंद्रीकरण का मुख्य आधार थी।

प्रश्न 2: राज्य प्रशासन में 'प्रधान' एवं 'बख्शी' के उत्तरदायित्वों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: प्रधान: यह राजा के बाद राज्य का सर्वोच्च प्रशासनिक व सैन्य अधिकारी होता था। राजा की अनुपस्थिति में दीवानी और फौजदारी शासन की जिम्मेदारी इसी की होती थी। जयपुर में इसे 'मुसाहिब' और मेवाड़ में 'प्रधान' कहते थे।

बख्शी: यह सैन्य विभाग का प्रमुख होता था। इसका मुख्य कार्य सेना की भर्ती, अनुशासन, रसद (सप्लाई), घोड़ों को दागने की व्यवस्था और युद्ध के समय सैन्य टुकड़ियों का प्रबंधन करना था।

प्रश्न 3: भू-राजस्व निर्धारण की 'लाटा' एवं 'कूँता' पद्धतियों में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: लाटा (बटाई): इस पद्धति में फसल कटने के बाद, अनाज को खलिहान (लाटा) में लाकर तोला जाता था और फिर राज्यांश (राजा का हिस्सा) का निर्धारण होता था। यह अधिक पारदर्शी व्यवस्था थी।

कूँता: इसमें फसल कटने से पहले ही, खड़ी फसल को देखकर अनुभवी अधिकारियों द्वारा अनुमान के आधार पर सरकारी कर (राजस्व) तय कर दिया जाता था। इसमें अक्सर किसानों के शोषण की गुंजाइश अधिक रहती थी।

प्रश्न 4: 'खालसा' एवं 'जागीर' भूमि के मध्य मुख्य अंतर क्या थे?

उत्तर: खालसा भूमि: यह भूमि सीधे राजा (केंद्र) के नियंत्रण में होती थी। यहाँ से एकत्रित होने वाला संपूर्ण भू-राजस्व सीधे शाही खजाने (राजकोष) में जमा होता था और इसका प्रबंधन सरकारी अधिकारियों (हाकिम) द्वारा किया जाता था।

जागीर भूमि: यह भूमि राजा द्वारा सामंतों, चारणों, ब्राह्मणों या विशिष्ट सैन्य सेवा के बदले अधिकारियों को आवंटित की जाती थी। इस भूमि का राजस्व प्रबंधन और कर वसूली संबंधित जागीरदार स्वयं करते थे।

प्रश्न 5: परगना प्रशासन की संरचना एवं प्रमुख अधिकारियों की भूमिका स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: राजस्थान में राज्य कई परगनों (जिलों) में विभाजित था। इसका मुख्य प्रशासनिक अधिकारी हाकिम होता था, जो कानून-व्यवस्था और न्याय देखता था। राजस्व वसूली के लिए आमिन, भूमि अभिलेखों के लिए कानूनगो तथा नागरिक सुरक्षा व कर नियंत्रण के लिए शिकदार और पोद्दार (खजांची) प्रमुख अधिकारी होते थे। यह केंद्रीय और ग्राम प्रशासन के बीच की मुख्य कड़ी था।

प्रश्न 6: 18वीं शताब्दी में मराठों के हस्तक्षेप का राजस्थान की राजस्व व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर: मराठा आक्रमणों और आंतरिक हस्तक्षेप के कारण राजस्थान के राज्यों पर भारी आर्थिक संकट आ गया। राजकोष रिक्त होने से राज्यों को मराठों को 'चौथ' (सुरक्षा कर) और 'सरदेशमुखी' देनी पड़ी। इसकी भरपाई के लिए शासकों ने जागीरदारों और किसानों पर नए कर (लाग-बाग) लाद दिए, जिससे कृषि व्यवस्था जर्जर हो गई और पारंपरिक राजस्व ढांचा पूरी तरह लड़खड़ा गया।

प्रश्न 7. 'रेख' से आप क्या समझते हैं?

उत्तर: राजपूत काल में शासकों द्वारा अपने सामंतों से किए जाने वाले वित्तीय एवं सैन्य दावों का मुख्य आधार 'रेख' था। यह जागीर की वार्षिक अनुमानित आय होती थी, जो पट्टे (राजकीय दस्तावेज) में दर्ज की जाती थी। रेख दो प्रकार की होती थी—'पटटो रेख' (अनुमानित आय) और 'भरतू रेख' (वास्तविक वसूली)। इसी के आधार पर सामंतों से चाकरी (सैन्य सेवा) और अन्य कर तय किए जाते थे।

प्रश्न 8. बांह पसाव से क्या तात्पर्य है?

उत्तर: 'बांह पसाव' मेवाड़ रियासत में प्रचलित एक विशिष्ट सामंती शिष्टाचार व अभिवादन की पद्धति थी। जब कोई जागीरदार या सामंत राजदरबार में उपस्थित होकर झुककर महाराणा की अचकन (पोशाक) को छूता था, तब महाराणा उसका अभिवादन स्वीकार करते हुए उसके कंधे पर अपना हाथ रखते थे। यह प्रक्रिया सामंत के प्रति शासक के सम्मान और आत्मीयता को दर्शाती थी।

प्रश्न 9. 'तलवार बंधाई' क्या है?

उत्तर: यह राजपूत राज्यों में प्रचलित एक अनिवार्य सामंती उत्तराधिकार शुल्क था। जब किसी जागीरदार की मृत्यु के बाद उसका उत्तराधिकारी गद्दी पर बैठता था, तो उसे नए सामंत के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए शासक को यह दस्तूर (कर) चुकाना पड़ता था। शासक की उपस्थिति में नए सामंत की कमर पर तलवार बांधी जाती थी। इसे 'हुक्मनामा' या 'कैद खालसा' भी कहा जाता था।

प्रश्न 10. सामंती व्यवस्था में 'नेग' को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: राजस्थान के सामंतवादी समाज में सामाजिक, धार्मिक तथा मांगलिक उत्सवों (जैसे विवाह, जन्म, त्योहार) के अवसरों पर दी जाने वाली पारंपरिक आर्थिक भेंट को 'नेग' कहा जाता था। यह व्यवस्था पदानुक्रम पर आधारित थी, जिसके तहत शासक को सामंत द्वारा तथा सामंत को उसके अधीनस्थ अनुसामंत या प्रजा द्वारा नेग (आर्थिक उपहार) प्रदान की जाती थी।

प्रश्न 11. 'फरमान' से क्या तात्पर्य है?

उत्तर: 'फरमान' मुगल प्रशासनिक व्यवस्था में बादशाह द्वारा जारी किया जाने वाला सर्वोच्च और अपरिवर्तनीय शाही आदेश होता था। इस पर बादशाह की शाही मुहर (तुघरा) अंकित होती थी। यह आदेश कभी सार्वजनिक हित में सामान्य जनता के लिए, तो कभी विशेष रूप से मनसबदारों और अधीनस्थ राजपूत शासकों को प्रशासनिक या सैन्य निर्देश देने के लिए जारी किया जाता था।

भाग ब: निबन्धात्मक प्रश्न (शब्द सीमा: 100-150 शब्द)

प्रश्न 12: 18वीं शताब्दी के अंत तक राजस्थान के राजपूत राज्यों की प्रशासनिक संरचना का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।

उत्तर: 18वीं शताब्दी के अंत तक राजस्थान की प्रशासनिक संरचना पारंपरिक हिंदू सिद्धांतों और मुगल प्रभाव का एक मिश्रित रूप थी।

  • केंद्रीय प्रशासन: राजा शासन का केंद्र बिंदु और सर्वोच्च न्यायधीश, सेनापति व शासक होता था। उसकी सहायता के लिए प्रधान (मुसाहिब), बख्शी (सैन्य प्रमुख) और दीवान (वित्त मंत्री) जैसे उच्चाधिकारी होते थे।
  • स्थानीय प्रशासन: राज्य परगनों में और परगने ग्रामों में बंटे थे। परगने का प्रशासन 'हाकिम' के हाथ में था, जबकि ग्रामीण स्तर पर 'पटवारी' और 'चौधरी' के सहयोग से पंचायतें स्थानीय विवादों और राजस्व का निपटारा करती थीं।

आलोचनात्मक बिंदु: यह व्यवस्था सैद्धांतिक रूप से सुव्यवस्थित दिखती थी, लेकिन व्यावहारिक रूप से अत्यधिक विकेंद्रीकृत थी। राजा की शक्ति जागीरदारों की वफादारी पर टिकी थी। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कमजोर उत्तराधिकारियों, मराठों की लूटपाट और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के कारण यह ढांचा कमजोर हो गया। कानून-व्यवस्था ठप होने से केंद्रीय नियंत्रण शिथिल पड़ गया, जिसने अंततः 1818 की ब्रिटिश संधियों का मार्ग प्रशस्त किया।

प्रश्न 13: राजस्थान की भू-राजस्व व्यवस्था के क्रमिक विकास और इसके सामाजिक-आर्थिक प्रभावों पर चर्चा कीजिए।

उत्तर: राजस्थान की भू-राजस्व व्यवस्था मध्यकाल में मुख्यतः 'भाग' या 'बटाई' (उपज का एक हिस्सा) पर आधारित थी। मुगल संपर्क के बाद इसमें नकदी कर (बिघोड़ी या जप्ती) का प्रचलन बढ़ा। राजस्व निर्धारण के लिए लाटा, कूँता और मुक्ता (एकमुश्त राशि) जैसी प्रणालियाँ अपनाई जाती थीं।

सामाजिक-आर्थिक प्रभाव:

  1. किसानों का शोषण: 18वीं शताब्दी के अंत में मराठों को दी जाने वाली भारी रकम (खिराज) के कारण राजाओं ने करों की दरें अत्यधिक बढ़ा दीं। मूल लगान के अलावा दर्जनों प्रकार की 'लाग-बाग' (उपकर) थोप दी गईं, जिससे किसान कर्ज के जाल में फंस गए।
  2. मध्यस्थों का उदय: कर वसूली के लिए इजारेदारी (ठेकेदारी प्रथा) को बढ़ावा मिला। इजारेदारों और पटवारियों जैसी प्रशासनिक जातियों का सामाजिक प्रभाव बढ़ा, जबकि मूल उत्पादक (किसान) भूमि से बेदखल होने लगे।
  3. कृषि का पतन: अत्यधिक कर के कारण किसानों ने कृषि में रुचि लेना कम कर दिया, जिससे ग्रामीण आत्मनिर्भरता समाप्त हो गई और अकाल के समय आर्थिक स्थिति अत्यंत भयावह हो गई।

प्रश्न 14: "शासक और जागीरदार के बीच के संबंधों ने राजस्थान के राजनीतिक परिदृश्य को परिभाषित किया।" इस कथन के आलोक में सामंती व्यवस्था का परीक्षण कीजिए।

उत्तर: राजस्थान की राजनीतिक स्थिरता और प्रशासनिक सुदृढ़ता पूर्णतः राजा (स्वामी) और जागीरदार (सामंत) के पारस्परिक संबंधों पर निर्भर थी। यहाँ का सामंतवाद कबीलाई और पारिवारिक रक्त-संबंधों (भाई-बंट) पर आधारित था, जहाँ सामंत राजा को अपना स्वामी न मानकर 'समान श्रेणी का बंधु' मानते थे।

संबंधों का राजनीतिक प्रभाव:

  1. सकारात्मक पक्ष: जब तक राजा योग्य रहे, जागीरदारों ने 'रेख' (सैन्य कर) और 'चाकरी' (सैन्य सेवा) के माध्यम से राज्य की सीमाओं की रक्षा की। मुगलों के खिलाफ युद्धों में यह सामंती एकता ही राज्यों का मुख्य संबल थी।
  2. नकारात्मक पक्ष (18वीं शताब्दी में): कमजोर केंद्रीय शासकों के काल में यह व्यवस्था अभिशाप बन गई। जोधपुर, मेवाड़ और जयपुर जैसे राज्यों में उत्तराधिकार के संघर्षों में जागीरदारों ने गुटबंदी शुरू कर दी। अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए उन्होंने मराठों और पिंडारियों को आमंत्रित किया।

निष्कर्ष: सामंतों की इस आपसी प्रतिद्वंद्विता और राजा विरोधी रुख ने राजस्थान को राजनीतिक रूप से इतना कमजोर कर दिया कि यहाँ के शासकों को अपनी सुरक्षा के लिए ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की शरण में जाना पड़ा।

प्रश्न 15. राजस्थान में सामंती व्यवस्था के सामाजिक प्रभाव की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।

उत्तर: राजस्थान की सामंती व्यवस्था ने यहाँ के सामाजिक ताने-बाने और रीति-रिवाजों पर गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव डाला। इस व्यवस्था के कारण समाज में कई गंभीर सामाजिक कुप्रथाओं को संस्थागत रूप मिला।

सामंतों और शासकों के विलासितापूर्ण जीवन और अपनी प्रतिष्ठा को बढाकर दिखाने की होड़ के कारण समाज में बाल विवाह, वृद्ध विवाह और अनमेल विवाह का प्रचलन बढ़ा। राजपूत कुलीन वर्ग में विवाह के अवसरों पर कन्या के साथ दहेज के रूप में 'गोला-गोली' (दास-दासियों) को वस्तुओं की भांति भेंट करने की कुप्रथा (डावरिया प्रथा) विकसित हुई। इसके अतिरिक्त, सती प्रथा, कन्या वध, जौहर प्रथा, मनुष्यों (लड़के-लड़कियों) का क्रय-विक्रय तथा बंधुआ मजदूरी को बढ़ावा देने वाली 'सागड़ी' व 'बेगार प्रथा' जैसी सामाजिक बुराइयाँ इसी सामंती शोषणकारी तंत्र के दुष्परिणाम थे। समाज में ऊंच-नीच और जातीय भेदभाव अत्यधिक सुदृढ़ हुआ, जिसने आम जनता के सामाजिक व नैतिक उत्थान को बुरी तरह बाधित किया।

प्रश्न 16. मध्यकालीन राजस्थान की राजस्व व्यवस्था में किन्हीं पांच लाग-बागों (उपकर) के बारे में बताइए।

उत्तर: मध्यकालीन राजस्थान में किसानों से मूल भू-राजस्व (भोग) के अतिरिक्त वसूले जाने वाले विभिन्न प्रकार के स्वेच्छाचारी उपकरों को 'लाग-बाग' कहा जाता था। प्रमुख पांच लाग-बाग निम्नलिखित हैं:

  1. राली लाग: इसके तहत प्रतिवर्ष प्रत्येक काश्तकार (किसान) को अपने फटे-पुराने कपड़ों से एक गद्दा या 'राली' बनाकर देनी होती थी, जो जागीरदार या उसके कर्मचारियों के बिछाने के काम आती थी।
  2. बकरा लाग: जागीरदार के स्वयं के भोजन (मांसाहार) के लिए प्रत्येक काश्तकार से एक बकरा लिया जाता था। बाद में कुछ जागीरदारों ने इसके बदले प्रति परिवार ₹2 वार्षिक नकद वसूलना शुरू कर दिया।
  3. अंग लाग: यह एक प्रकार का शारीरिक कर था, जिसमें किसान के परिवार के 5 वर्ष से अधिक आयु के प्रत्येक सदस्य पर ₹1 प्रति व्यक्ति की दर से कर लगाया जाता था।
  4. खर गढ़ी लाग: दुर्ग निर्माण या सार्वजनिक निर्माण कार्यों के लिए गाँवों से बेगार में गधे मंगवाए जाते थे। कालांतर में गधों के स्थान पर 'खर गढ़ी लाग' के रूप में नकद राशि वसूली जाने लगी।
  5. चंवरी लाग: किसान की पुत्री या पुत्र के विवाह के अवसर पर जागीरदार द्वारा ₹1 से ₹25 तक की राशि चंवरी कर के रूप में ली जाती थी, जो किसानों पर भारी आर्थिक बोझ थी।

प्रश्न 17. "मध्यकालीन राजस्थान की सामंती संस्कृति की विद्यमानता ने राज्य के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाला।" आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।

उत्तर: मध्यकालीन सामंती संस्कृति ने राजस्थान के सर्वांगीण विकास को अवरुद्ध करने में बड़ी भूमिका निभाई, जिसे निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

  • क्षेत्रीय कूपमंडूकता: सामंत रूढ़िवादी थे और जागीर में बाहरी प्रभाव रोकने के लिए न तो परिवहन का विकास करते थे और न ही लोगों को भूमि बेचकर बाहर जाने देते थे, जिससे दृष्टिकोण संकुचित रहा।
  • कृषि का ह्रास: ब्रिटिश भारत में जहां कृषि का आधुनिकीकरण हो रहा था, वहीं सामंतों ने पारंपरिक कृषि पद्धतियों को ही बनाए रखा और सिंचाई या वैज्ञानिक तकनीकों पर कोई ध्यान नहीं दिया।
  • आर्थिक शोषण व विद्रोह: शानो-शौकत के लिए सामंतों ने करों और बेगार में अत्यधिक वृद्धि की, जिसके परिणामस्वरूप बिजौलिया जैसे तीव्र कृषक आंदोलन हुए। इससे कृषि व्यवस्था और शांति दोनों भंग हुई।
  • व्यापार व परिवहन में बाधा: सामंत व्यापारियों के काफिलों से भारी कर वसूलते थे और कभी-कभी उन्हें लूट लेते थे, जिससे व्यापार-वाणिज्य हतोत्साहित हुआ।
  • पलायन को विवशता: उद्योगों को वित्तीय प्रोत्साहन न मिलने के कारण यहाँ के प्रतिभावान व्यवसायियों को देश के अन्य हिस्सों (जैसे कोलकाता, मुंबई) में पलायन करना पड़ा।
  • विलासिता व फिजूलखर्ची: मुगलों और अंग्रेजों के संरक्षण के बाद सैन्य दायित्व खत्म होने से सामंत विलासिता (मदिरा और नृत्य) में डूब गए। आपसी द्वेष और विवाहों में अत्यधिक फिजूलखर्ची का अंतिम बोझ जनता पर ही पड़ा।

प्रश्न 18. अकबर की राजपूत नीति का उल्लेख कीजिए तथा यह बताइए कि इस नीति ने मुगल-राजपूत संबंधों को कहां तक प्रभावित किया?

उत्तर: अकबर की राजपूत नीति मुख्य रूप से 'सुलह-ए-कुल' (सभी के साथ शांति) के सिद्धांत पर आधारित थी, जिसका उद्देश्य राजपूतों की सैन्य शक्ति का उपयोग कर मुगल साम्राज्य को स्थायित्व प्रदान करना था। इतिहासकार आर.पी. त्रिपाठी के अनुसार, अकबर शाही संघ के प्रति राजपूतों की केवल निष्ठा चाहता था, जिसके तहत चार मुख्य शर्तें थीं—निश्चित खिराज (कर) देना, स्वतंत्र विदेश नीति व आपसी युद्ध का त्याग, आवश्यकता पड़ने पर मुगल केंद्र को सैन्य बल देना और स्वयं को साम्राज्य का अभिन्न अंग मानना।

इस नीति ने मुगल-राजपूत संबंधों को निम्नलिखित रूप से गहराई से प्रभावित किया:

  • वतन जागीर एवं स्वायत्तता: अधीनता स्वीकार करने वाले शासकों को उनकी पैतृक भूमि (वतन जागीर) लौटा दी गई तथा उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने और बाहरी सुरक्षा की गारंटी दी गई।
  • प्रशासनिक भागीदारी: राजपूतों को योग्यता के अनुसार उच्च मनसब और सूबेदारी प्रदान कर साम्राज्य के विस्तार व संचालन (जैसे मानसिंह, रायसिंह) में भागीदार बनाया गया।
  • टीका प्रथा: राजा के उत्तराधिकार की वैधता के लिए मुगल सम्राट द्वारा 'टीका' लगाने की प्रथा शुरू की गई, जिसने शासकों के चयन में मुगल वर्चस्व स्थापित किया।
  • एकीकरण के प्रयास: राजपूताना के राज्यों को प्रशासनिक रूप से 'अजमेर सूबे' के अंतर्गत संगठित किया गया और स्थानीय टकसालों की जगह मुगलिया मुद्राओं का प्रचलन शुरू कर राजनीतिक व आर्थिक एकीकरण किया गया। जो राज्य झुके नहीं (जैसे मेवाड़), उन्हें सैन्य शक्ति से जीता गया।

 

विशेष आभार (Special Thanks): इस प्रश्नोत्तरी/सामग्री को तैयार करने में अपना अमूल्य योगदान देने वाले सम्मानित लेखकगण — श्री पी. के. नागौरी एवं SGGP Team का हम सहृदय धन्यवाद करते हैं। 

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आशा है इस अभ्यास से आपकी RAS & UPSC Mains तैयारी को नई दिशा मिली होगी! यह पोस्ट और क्विज़ आपको कैसा लगा? अपने विचार और सुझाव कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें। इसे अपने साथी एस्पिरेंट्स के साथ भी शेयर करें। और अधिक महत्वपूर्ण क्विज़ के लिए अभी 9015746713 पर WhatsApp करें। निरंतर प्रयास करते रहें, सफलता निश्चित है!

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