Financial Sources ( वित्त के स्रोत )

Financial Sources

वित्त के स्रोत 

 

वित्त का अर्थ ( Meaning of finance )

वित्त से तात्पर्य उस नकद या ऋण की राशि की व्यवस्था से हैं जो संगठन के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आवश्यक है।

  • प्रोफेसर कुच्छल के अनुसार – “वित्त एक प्रक्रिया है जो संचित कोषों को उत्पादक उपयोगों में परिवर्तित करती है।”
  • F.W. पेश के शब्दों में –  “मुद्रा का उपयोग करने वाली आधुनिक अर्थव्यवस्था में वित से आशय मुद्रा की उस समय उपलब्धि से हैं जब इसकी आवश्यकता हो।

पूंजी का वर्गीकरण ( Classification of capital )

निवेश के आधार पर ( On the basis of investment )-

  1. स्थाई पूंजी ( Fixed capital )- व्यवसाय की स्थाई संपत्ति के क्रय के लिए विनियोग की जाती है। यह व्यवसाय में काफी लंबी अवधि तक बनी रहती है।
  2. कार्यशील पूंजी ( working capital )- यह पूंजी कच्चे माल के क्रय, मजदूरी, कर्मचारियों के वेतन एवं दैनिक व्ययों के भुगतान के लिए आवश्यक होती है।

अवधि के आधार पर ( On the basis of period )

  1. दीर्घकालीन पूंजी ( Long term capital )- जो व्यवसाय में बहुत लंबे समय के लिए विनियोजित की जाती है। ऐसी पूंजी व्यवसाय में संस्था के जीवन काल तक बनी रहती है।
  2. मध्यकालीन पूंजी ( Median capital ) – कुल पूंजी का वह भाग जो उद्योग के विस्तार और विकास के लिए प्राप्त किया जाता है। प्रत्येक उद्योग में समय के अनुसार भी मध्यकालीन पूंजी की मांग में अंतर पड़ सकता है।
  3. अल्पकालीन पूंजी ( Short term capital ) – दिन प्रतिदिन के कार्यकलापों के लिए कच्चे माल, पक्के के माल के क्रय के भुगतान करने के लिए पूंजी जुटानी पड़ती है।

वित्तीय स्रोत ( Financial Resources )

स्थायी या दीर्घकालीन स्रोत ( Fixed or long term sources )

1. साधारण अंश या समता अंश ( Ordinary fraction )- समता अंश वे हैं जिनके धारकों को कंपनी के संचालन की सामान्य जोखिम को उठाना होता है। इन अंशों के धारकों कंपनी के प्रबंध एवं संचालन को नियमित एवं नियंत्रित करने का अधिकार होता है।

2. पूर्वाधिकार अंश ( Preference share )- उन अंशों से हैं, जिन पर अंश धारियों को एक निश्चित दर से प्रतिवर्ष लाभांश पाने का अधिकार होता है तथा समापन के समय पूंजी की वापसी का पूर्व अधिकार होता है।

3. ऋण पत्र ( Loan letter )- ऋण पत्र कंपनी के सार्वमुद्रा के अधीन जारी एक ऐसा प्रलेख है जो कंपनी पर ऋण को प्रमाणित करता है तथा ऋण की प्रमुख शर्तों को प्रकट करता है।

4. अर्जित आय का पुनः निवेश ( Re-invested income )- कम्पनी या संस्था लाभ का एक भाग भविष्य की आवश्यकता के लिए संचय करके रख लेती है। संचित लाभ को कंपनी अपनी पूंजी के रूप में प्रयोग कर लेती है। उसे अर्जित आय का पुनः निवेश कहते हैं।

5. विशिष्ट वित्तीय संस्थाएं ( Specific financial institutions ) राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर अनेक वित्तीय संस्थाएं हैं जो व्यवसायिक संस्थाओं को अनेक प्रकार की वित्तीय साधन उपलब्ध करा रही है। जैसे भारतीय औद्योगिक वित्त निगम, भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक, भारतीय औद्योगिक निवेश बैंक आदि।

6. लीज पट्टे पर वित्त- इसमें वित्त नकद रूप में प्राप्त, नहीं होता है बल्कि मशीन उपकरण या अन्य पूंजी संपत्ति के रूप में प्राप्त होता है।

7. अन्य स्रोत ( Other sources )

  1. विदेशों से ऋण
  2. विदेशी प्रत्यक्ष निवेश
  3. विदेशी वित्तीय संस्थाएं
  4. निवेश ट्रस्ट या प्रन्यास
  5. सहयोग निधियां

अल्पकालीन वित्त के स्रोत ( Short term finance sources )

1. सार्वजनिक निक्षेप या जमाएं ( Public deposits or deposits )- एकाकी व्यापार या साझेदारी संस्थाएं केवल अपने संबंधियों से ही व्यवसायिक उद्देश्यों के लिए जमाएं स्वीकार कर सकते हैं तथा केवल निजी कार्यों के लिए ही जन सामान्य से जमाएं स्वीकार कर सकते हैं।

2. व्यापारिक ऋण या साख ( Trade credit or credit ) – 

  • चालू उधार खाता –  कुछ स्थायी ग्राहक होते हैं। वह माल क्रय करते हैं। ऐसी दशा में उनके खातों में एक निश्चित राशि का माल उधार बेचने की शर्त हो सकती है। उधार की राशि की सीमा का निर्धारण क्रेता की आर्थिक स्थिति एवं भुगतान प्रवृत्ति को ध्यान में रखकर किया जाता है।
  • विनिमय विपत्र – – विक्रेता व्यापारी माल बेचते समय ही माल के भुगतान के लिए विनिमय विपत्र लिख देता है तथा क्रेता उसे स्वीकार कर लेता है।
  • प्रतिज्ञा पत्र – कई व्यापारी माल खरीदने के साथ ही माल के मूल्य के भुगतान की तिथि का एक प्रतिज्ञा पत्र लिख देते हैं। इन में लिखी तिथि पर विक्रेता क्रेता से धन की मांग कर लेता है तथा क्रेता भुगतान कर देता है।
  • हुण्डियां – व्यापारी कई बार माल क्रय करने के साथ ही हुण्डी लिखकर देते हैं। हुण्डी में लिखित तिथि को भुगतान हो जाता है।
  • अदत्त खर्चे- कुछ खर्चे देय होने के बहुत दिनों बाद भुगतान करना पड़ता है। उदाहरण – बिक्री कर, आयकर, बिजली के बिल की राशि आदि।

3. व्यापारिक बैंक ( Trading bank ) व्यापार की अल्पकालीन ऋणों की आवश्यकता को पूरा करते हैं। इनके द्वारा प्रदत ऋणों को चालू पूंजी के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है।

4. ह्रास कोष ( Depletion fund )- संपत्तियों जैसे भवन, मशीन आदि के लिए ह्रास कोष बनाया जाता है ताकि संपत्तियों के बेकार हो जाने या अप्रचलित हो जाने पर नई संपत्तियों का क्रय किया जा सके। इस राजकोष का उपयोग अल्पकालीन वित्त के स्रोत के रूप में किया जा सकता है।

5. साहूकार या देशी बैंकर ( Moneylender or native banker ) – देशी बैंकर्स अपना व्यवसाय पारिवारिक या व्यक्तिगत रूप से किया करते हैं। देशी बैंकर्स को विभिन्न नामों से जैसे साहूकार, सेठ, महाजन आदि नामों से पुकारते हैं।छोटी व्यवसायिक संस्थाओं, एकाकी व्यापारी तथा साझेदारी संस्थाओं के लिए इस स्रोत का विशेष महत्व है।

6. गैर बैंकिंग वित्तीय कम्पनियां ( Non-banking financial companies ) – वित्तीय कंपनियां जो जनता से अनेक बचत योजनाओं के अंतर्गत धन प्राप्त करती है और उस धन को उद्योगों को उधार पर दे देती है। यह कंपनियां अंशों, ऋण पत्रों, प्रतिज्ञापत्रों, बिलों एवं हुंडियों पर भी ऋण उपलब्ध कराती है।

7. ग्राहकों से अग्रिम ( Advance from customers )- कई व्यवसायिक संस्थाएं अपनी अल्पकालीन पूंजी की आवश्यकता की पूर्ति के लिए ग्राहकों से माल के आदेश के साथ ही अग्रिम ले लेती है। यह स्रोत उन संस्थाओं के लिए खुला है जिनके द्वारा उत्पादित माल की मांग बहुत अधिक है।

8. वाणिज्य पत्र ( Commercial paper )- वाणिज्य पत्र 15 दिन से 1 वर्ष की अवधि के लिए 5 लाख या उसके गुणक के रूप में वित्तीय संस्थाओं द्वारा जारी किए जाने वाले आरक्षित वचन पत्र है, जो अंकित मूल्य से छूट पर जारी किए जाते हैं एवं परिपक्वता पर अंकित मूल्य का भुगतान किया जाता है।

9. आढतीकरण ( Overture ) – यह देनदारियों का एक प्रकार का विक्रय है जिसमें बैंक या वित्तीय संस्थान को देनदारी वसूलने का अधिकार दे दिया जाता है एवं इसकी एवज में कुछ बट्टा काटकर कम राशि पहले ही ले ली जाती है। यह आलम्बन सहित एवं रहित हो सकता है।

10. अन्य स्रोत ( other sources ) – ज्यादा कंपनियों की दशा में एक कंपनी अपने संचालकों के अधीन दूसरी कंपनी से ऋण प्राप्त कर सकती है। कई संस्थाएं दलालों के माध्यम से भी ऋण प्राप्त कर सकती है। विदेशों से व्यापारिक ऋण प्राप्त किया जा सकता है। जमा प्रमाण पत्र योजना के अधीन भी बैंकों से ऋण प्राप्त किया जा सकता है।

 

Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

P K Nagauri