Fundamental Rights – मूल अधिकार

Fundamental Rights 

मूल अधिकार

मूल अधिकारो का जन्म 1215 में ब्रिटेन या इंग्लैंड में हुआ। 1215 के अधिकार पत्र को मौलिक अधिकारो का मैग्नाकार्टा कहा जाता हे। फ्रांस के नागरिकों को एक अधिनियम के तहत 1789 में अधिकार प्रदान किए गए

अमेरिका विश्वव का पहला देश था जिसने अपने सविधान में 1791 में किये गए प्रथम 10 सविधान संशोधनों के तहत सविधान के माध्य्म से नागरिको को मूल अधिकार प्रदान किये। इन्ही 10 संशोधनों का सामूहिक रूप से बिल ऑफ़ राईट कहा जाता हे।

भारत में सर्वप्रथम अधिकारों की मांग स्वराज्य विधेयक 1895 में की गई थी जो बालगंगाधर तिलक के निर्देशन में तैयार किया गया था नेहरू रिपोर्ट अगस्त 1928 में भी भारतीय नागरिकों हेतु मौलिक अधिकारों की मांग की गई थी 

U.N.O. की सामाजिक व आर्थिक परिषद द्वारा 1946 में श्री मती ऐलोनोर रूजवेल्ट की अद्यक्षता में घटित मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के आधार पर U.N.O. ने 10 दिसंबर 1948 को मानवाधिकारों की विश्व व्यापी घोषणा की

अंतराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस या मानवाधिकार दिवस:- 10 दिसंबर
राष्ट्रिय मानवाधिकार दिवस:- 10 अक्टूबर

कैबिनेट मिशन योजना 1946 के तहत सरदार वल्लभ भाई पटेल की अध्यक्षता में मौलिक अधिकारों हेतु एक समिति का गठन किया गया इसी समिति के आधार पर 7 सदस्य उप समिति का गठन किया गया

  1. जे बी कृपलानी (अध्यक्ष)
  2. मीनू मसानी
  3. के टी शाह
  4. अलादी कृष्णास्वामी अय्यर
  5. के एम मुंशी
  6. राजकुमार अमृत कौर
  7. के एम पनिक्कर

इस समिति की सिफारिश पर ही भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों को समाहित किया गया है

मूल अधिकार का महत्व

मौलिक अधिकारों को मूल विधि या संविधान के स्थान पर प्रदान किया जाता है इन्हें संविधान संशोधन की विशिष्ट विधि द्वारा परिवर्तित किया जा सकता है इनका राज्य द्वारा अतिक्रमण नहीं किया जा सकता है दूसरे शब्दों में यह राज्य कि व्यक्ति के विरुद्ध स्वेच्छाचारिता पर रोक हैं

मौलिक अधिकार प्रजातंत्र के आधार स्तंभ है इन के अभाव में व्यक्ति का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है मौलिक अधिकारों को न्याय की सुरक्षा भी प्राप्त होती है इनका किसी भी प्रकार से उल्लंघन होने से नागरिक न्यायालय का संरक्षण प्राप्त कर सकता है

भारत में मूल अधिकार (12 से 35 )

भारतीय सविधान के भाग -3 के अनुछेद 12 से 35 तक नागरिको को 7 मूल अधिकार प्रदान किये गए थे जो की अमरीकी सविधान से लिए गए थे। भाग-3 को Bill of Right भी कहा जाता हे।

व्यक्तिगत स्वतन्त्रताओं को सुनिश्चित करने हेतु मूल अधिकारो को भारतीय सविधान में सामिल किया गया। इनकी प्रवित्ति नकारात्मक या निषेधात्मक होती हे। अनु. 12 के तहत मूल अधिकार व्यक्ति व नागरिको को राज्य के विरुद्ध प्रदान किये गए हे।

अनु. 13 के तहत यदि व्यक्ति के मूल अधिकारो का हनन हो रहा हो तो वह उनकी रक्षा हेतु न्यायालय की शरण ले सकता हे। इसी अनुछेद के तहत मूल अधिकारो पर न्यायिक शक्ति कार्य करती हे । अर्थात मूल अधिकार वाद योग्य होते हे।

44 वे सविधान संशोधन 1978 के तहत अनु. 31में वर्णित सम्पति के मूल अधिकार को मौलिक अधिकारो की श्रेणी से निकालकर सविधान के भाग-12 के अनु. 300(क) के तहत एक कानूनी अधिकार बना दिया गया इस कारण वर्तमान में उनकी संख्या 6 हे

  1. समानता का अधिकार ( 14-18 )
  2. स्वतन्त्रता का अधिकार ( 19-22 )
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार ( 23-24 )
  4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार ( 25-28 ) 
  5. संस्कृति एवम् शिक्षा का अधिकार  ( 29-30 )
  6. सवेधानिक उपचारो का अधिकार ( 32-35 )

नोट:- धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार सार्वजानिक ( लोक ) सदाचार एवम् स्वास्थ्य द्वारा सिमित किया गया हे।

नोट:- सर्वोच्च न्यायालय अनु.32 के तहत उच्च न्यायालयो अनु.226 के तहत व्यक्ति के मूल अधिकारो की रक्षा हेतु पांच प्रकार की रीट या आदेश जारी कर सकते हे-

  1. बंदी प्रत्यक्षिकरण
  2. परमादेश
  3. प्रतिवेद
  4. उत्प्रेषण
  5. अधिकार प्रेच्छा।

भीमराव अम्बेडकर ने अनु.32 को भारतीय संविधान की आत्मा कहा हे तथा कहा हे की यदि इस अनुच्छेद को सविधान से निकाल दिया जाए तो सम्पूर्ण भारतीय सविधान शून्य धोषित हो जाएगा।

नोट:- मूल अधिकारो के अलावा अन्य अधिकारो की रक्षा हेतु उच्च न्यायालयो की क्षरण ली जाती हे तथा उच्च न्यायालयो ऎसे अधिकारो के सम्बध् में इंजेकशन नामक रिट जारी करता हे। इसी लिए कहा जाता हे की रिट जारी करने के सम्बध में उच्च न्यायालय का क्षेत्र विस्तृत होता हे।

मूल अधिकारो को निलम्बीत करने कि शक्ति आपात काल में राष्ट्रपति को प्राप्त हे।

मौलिक अधिकारों से संबंधित वाद – 

  • शंकरी प्रसाद बनाम भारत सरकार 1951 के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दिया कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती हैं ।
  • सज्जन सिंह बनाम राजस्थान सरकार 1964 के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दिया कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है ।
  • गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य 1967 के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दिया कि संसद नातों मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है और ना ही उन्हें सीमित या प्रतिबंधित कर सकती है।
  • केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य 1973 के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय किया कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन तो कर सकती है किंतु उस सीमा तक जब तक कि संविधान के मूल ढांचे को कोई नुकसान ना हो।

अनुच्छेद 13 में विधि शब्द को परिभाषित किया गया है।

 नोट – पहली बार मूल ढांचे या आधारभूत ढांचे की संकल्पना केशवानंद भारती मामले में उजागर हुई।

मौलिक अधिकारों का निलंबन

  • अनुच्छेद 35 संसद द्वारा
  • अनुच्छेद 34 संसद और सेना द्वारा ।
  • अनुच्छेद 352 संसद द्वारा ।
  • अनुच्छेद 368 संसद (संविधान संशोधन) द्वारा।

 

Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

लाल शंकर पटेल डूंगरपुर, सुभाष शेरावत जयपुर, Dipa, महेन्द्र चौहान