National Integration and Reorganization राष्ट्रीय एकीकरण एवं पुनर्गठन

National Integration and Reorganization

स्वातंत्र्योतर काल में राष्ट्रीय एकीकरण एवं पुनर्गठन 

अतिलघुतरात्मक (15 से 20 शब्द)

प्र 1. लाल बहादुर शास्त्री ?

उत्तर- लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे। 1930 स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी की। 1951 से 64 तक केंद्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री पद पर रहे। इन्होंने ‘जय जवान जय किसान’ का मशहूर नारा दिया था।

प्र 2. राजकुमारी अमृत कौर ?

उत्तर- राजकुमारी अमृत कौर (1889- 1964 )गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी, कपूरथला के राज परिवार में जन्म, विरासत में माता से ईसाई धर्म मिला, संविधान सभा की सदस्य, स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री, 1957 तक स्वास्थ्य मंत्री के पद पर रही।

प्र 3. भारत की आजादी के समय तक कौन सी रियासतें भारत संघ में सम्मिलित नहीं हुई?

उत्तर- 15 अगस्त 1947 तक 3 रियासतों जूनागढ़, जम्मू- कश्मीर तथा हैदराबाद को छोड़कर सभी रजवाड़े भारत संघ में शामिल हो गए।

प्र 4. पोट्टी श्रीरामालू ?

उत्तर- पोट्टी श्रीरामालू गांधीवादी कार्यकर्ता, नमक सत्याग्रह में भाग लेने के लिए सरकारी नौकरी छोड़ी। आंध्र प्रदेश नाम से अलग राज्य बनाने की मांग को लेकर 19 अक्टूबर 1952 से आमरण अनशन तथा 15 दिसंबर 1952 को अनशन के दौरान मृत्यु हो गई।

प्र 5. राज्य पुनर्गठन आयोग 1953 ?

उत्तर- अलग राज्य की मांगों के आंदोलनों को देखते हुए अगस्त 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन जस्टिस फजल अली की अध्यक्षता में किया गया। के एम पन्निकर और हृदय नाथ कुंजरू इसके सदस्य थे।

लघूतरात्मक ( 50 से 60 शब्द )

प्र 6. स्वातंत्र्योत्तर काल में इस आयोग का काम राज्यों के सीमांकन के मामले पर गौर करना थाराष्ट्र के समक्ष प्रमुख तीन चुनौतियां क्या थी?

उत्तर- स्वातंत्र्योत्तर काल में देश के समक्ष प्रमुख चुनौतियां निम्नलिखित थी-

  1. राष्ट्र निर्माण की : देश को एकता के सूत्र में बंधे एक ऐसे भारत को गढ़ने की थी, जिसमें भारतीय समाज की सारी विविधताओं के लिए जगह हो।
  2. लोकतंत्र को कायम करने की।
  3. ऐसा विकास जिसमें संपूर्ण समाज का भला हो ना कि कुछ तबकों का। वास्तविक चुनौती थी, आर्थिक विकास तथा गरीबी के खात्मे के लिए कारगर नीतियां तैयार करना था।

प्र 7. देशी रियासतों के एकीकरण में आ रही समस्याएं कौन सी थी?

उत्तर- देशी रियासतों के एकीकरण की समस्याएं-

  1. देशी रियासतों का स्वतंत्र रहने का दृष्टिकोण मुख्य समस्या थी।
  2. कांग्रेस के प्रति दृष्टिकोण आलोचनात्मक था। कांग्रेस ने प्रजामंडल आंदोलन में सहयोग दिया था।
  3. देशी राजाओं के मध्य समन्वय व स्पष्ट नीति का अभाव।
  4. विशेषाधिकारों की समाप्ति की संभावना।
  5. बड़े – छोटे देशी रियासतों को भारत संघ का हिस्सा बनाने की प्रक्रिया से संबंधित समस्याएं।
  6. भौगोलिक स्थिति, सांस्कृतिक विविधता व रियासतों का इधर उधर बिखरा होना।*

प्र 8. देशी रियासतों के विलय एवं राजनीतिक एकीकरण में जूनागढ़ का विलय कैसे हुआ? बताइए।

उत्तर- जूनागढ़ सौराष्ट्र के तट पर स्थित एक छोटी सी रियासत थी, जो चारों ओर से भारतीय भूभाग से गिरी थी। 15 अगस्त 1947 को जूनागढ़ के नवाब ने अपने राज्य का विलय पाकिस्तान के साथ करने की घोषणा की किंतु यहां की जनता जो सर्वाधिक हिंदू थी भारत संघ में सम्मिलित होना चाहते थे। पाकिस्तान ने जूनागढ़ के विलय का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया

किंतु यहां की जनता ने इस निर्णय के विरुद्ध एक जन आंदोलन संगठित किया और नवाब को पाकिस्तान भागने के लिए मजबूर कर दिया। नवाब के भागने के बाद जूनागढ़ के दीवान शाहनवाज भुट्टो ने भारत सरकार को हस्तक्षेप करने के लिए आमंत्रित किया तो भारतीय सेना राज्य में शांति स्थापना हेतु भेजी गई। फरवरी 1948 में रियासत के अंदर जनमत संग्रह कराया गया जिन का निर्णय भारत में विलय के पक्ष में था और जूनागढ़ का भारत में विलय कर दिया गया।

प्र 9. स्वातंत्र्योत्तर काल में भाषाई राज्यों की मांग से देश की एकता एवं अखंडता पर आंच और अलगाव की भावना का जोर पकड़ने की चिंता थी, लेकिन इसके विपरीत देश की एकता और ज्यादा मजबूत हुई। विवेचना कीजिए (निबन्धात्मक)

उत्तर- आजादी के बाद के शुरुआती सालों में एक बड़ी चिंता यह थी कि अलग राज्य बनाने की मांग से देश की एकता पर आँच आएगी। आशंका थी कि नए भाषाई राज्यों में अलगाववाद की भावना पनपेगी और नवनिर्मित भारतीय राष्ट्र पर दबाव बढ़ेगा। जनता के दबाव में आखिरकार नेतृत्व ने भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का मन बनाया।

उम्मीद थी कि अगर हर इलाके के क्षेत्रीय और भाषाई दावे को मान लिया गया तो बंटवारे और अलगाववाद के खतरे में कमी आएगी। इसके अलावा क्षेत्रीय मांगों को मानना और भाषा के आधार पर नए राज्यों का गठन करना एक लोकतांत्रिक कदम के रूप में भी देखा गया।

भाषावार राज्यों के पुनर्गठन की घटना को आज 50 साल से भी अधिक समय हो गया। हम कह सकते हैं कि भाषाई राज्य तथा इन राज्यों के गठन के लिए चले आंदोलनों ने लोकतांत्रिक राजनीति व नेतृत्व की प्रकृति को बुनियादी रूपों में बदला है। राजनीति और सत्ता में भागीदारी का रास्ता अब एक छोटे से अंग्रेजी भाषी अभिजात तबके के लिए ही नहीं, बाकियों के लिए भी खुल चुका था।

भाषावार पुनर्गठन से राज्यों के सीमांकन के लिए एक समरूप आधार भी मिला। बहुतों की आशंका के विपरीत इससे देश नहीं टूटा।इसके विपरीत देश की एकता और ज्यादा मजबूत हुई। सबसे बड़ी बात यह है कि भाषा वार राज्यों के पुनर्गठन से विविधता के सिद्धांत को स्वीकृति मिलीजब हम यह कहते हैं कि भारत में लोकतंत्र अपनाया है

तो इसका सीधा सा मतलब इतना भर नहीं होता है कि भारत में लोकतांत्रिक संविधान पर अमल होता है अथवा भारत में चुनाव करवाए जाते हैं। भारत के लोकतांत्रिक होने का एक अर्थ है। लोकतंत्र को चुनने का अर्थ था विभिन्नताओं को पहचानना और उन्हें स्वीकार करना। साथ ही यह मानकर चलना की विभिन्नताओं में आपसी विरोध भी हो सकते हैं।

दूसरे शब्दों में कहे तो भारत में लोकतंत्र की धारणा विचारों और जीवन पद्धतियों की बहुलता की धारणा से जुड़ी हुई थी। आगे के दिनों में अधिकतर राजनीति इसी दायरे में चली।

देश के अनेक इलाकों में छोटे-छोटे अलग राज्य बनाने की मांग को लेकर आंदोलन चल रहे हैं। महाराष्ट्र में विदर्भ, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हरित प्रदेश, पश्चिम बंगाल के उत्तरी भाग में राज्य बनाने के ऐसे आंदोलन चल रहे हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका की जनसंख्या अपने देश के मुकाबले एक चौथाई है लेकिन वहां 50 राज्य है। भारत में 100 से भी ज्यादा ज्यादा राज्य क्यों नहीं हो सकते? यह अभी ज्वलंत मुद्दा है। जिस पर विचार किया जाना आवश्यक है।

Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

P K Nagauri

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