National movement of India भारत का राष्ट्रीय आन्दोलन

National movement of India

भारत का राष्ट्रीय आन्दोलन

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अतिलघुतरात्मक (15 से 20 शब्द)

प्र 1. रोलेट एक्ट ?

उत्तर-रॉलेट ऐक्ट मार्च 1919 में भारत की ब्रिटानी सरकार द्वारा भारत में उभर रहे राष्ट्रीय आंदोलन को कुचलने के उद्देश्य से निर्मित कानून था। इसके अनुसार सरकार को यह अधिकार प्राप्त हो गया था कि वह किसी भी भारतीय पर अदालत में बिना मुकदमा चलाए और बिना दंड दिए उसे जेल में बंद कर सकती थी।

प्र 2. बारदोली सत्याग्रह ?

उत्तर- 1922- 1928 में गुजरात मे सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में प्रांतीय सरकार द्वारा किसानों पर लगाये गए 30% कर के विरोध में चलाया गया था। यह भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन ‘ का सबसे संगठित, व्यापक एवं सफल आन्दोलन रहा है।

प्र 3. अगस्त प्रस्ताव 1940 ?

उत्तर- वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने 8 अगस्त 1940 को एक घोषणा की, जिसके अंतर्गत डोमिनियन स्टेटस, युद्ध पश्चात संविधान बनाने के लिए एक निकाय के गठन, वायसराय की कार्यकारिणी का विस्तार तथा एक युद्ध समिति के गठन का प्रस्ताव था।

प्र 4. मार्गरेट नोबल ?

उत्तर- आयरलैंड की शिक्षित महिला, जो स्वामी विवेकानंद की शिष्या बनने के बाद सिस्टर निवेदिता के नाम से जानी गई। यह पश्चिमी देश की प्रथम महिला थी जिन्हें भारतीय मठावासीय जीवन क्रम में प्रवेश मिला। उन्होंने धर्म के राष्ट्रीय दर्शन के रूप में व्याख्या की।

प्र 5. मैडम भीकाजी कामा ।

उत्तर-मैडम भीकाजी कामा ने जर्मनी में भारत का पहला झंडा फहराया।’वन्दे मातरम’ और ‘मदन तलवार’ नामक दो क्रांतिकारी पत्रों का प्रकाशन किया। इन्हें ‘भारतीय क्रांतिकारियों की माता’ नाम से याद किया जाता है

प्र 6. अभिनव भारत संस्था ?

उत्तर- वी डी सावरकर ने 1906 में अभिनव भारत नामक क्रांतिकारी संस्था की स्थापना महाराष्ट्र में की। इसके जरिए उसने क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम दिया।

प्र 7. खुदाई खिदमतगार ?

उत्तर- प्रसिद्ध राष्ट्रवादी खान अब्दुल गफ्फार खान द्वारा 1929 में गठित यह संगठन अहिंसावादी क्रांतिकारियों का एक दल था। यह संगठन सुधारवादी तथा सामाजिक बदलाव का पक्षधर एवं कट्टर मुस्लिम विचारधारा का विरोधी था।

प्र 8. विलियम जॉन्स ?

उत्तर- प्रसिद्ध अंग्रेज विद्वान जिन्होंने 1784 में ‘एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल’ की स्थापना की। जिसने प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति के अध्ययन हेतु महत्वपूर्ण प्रयास किए।

प्र 9. रानी गाडिनेल्यू ?

उत्तर- नागालैंड में 13 वर्षीय नागा लड़की गाडिनेल्यू ने नागालैंड में सविनय अवज्ञा आंदोलन का नेतृत्व किया, जिसे बाद में रानी की उपाधि दी गई।

प्र 10. बटलर कमेटी रिपोर्ट।

उत्तर- बटलर कमेटी रिपोर्ट देशी रियासतों से संबंधित है। यह कमेटी सर्वोच्चता को परिभाषित करने के लिए बनाई गई थी, परंतु इस रिपोर्ट ने सर्वोच्चता को अपरिभाषित ही रखा और अत्यधिक आलोचनाओं की शिकार हुई।

लघूतरात्मक (50 से 60 शब्द)

प्र 11. भारत में राष्ट्रीय आंदोलन के प्रवाह को प्रभावित करने में तिलक का क्या योगदान है?

उत्तर- एक राजनीतिक नेता के रूप में तिलक ने केसरी तथा मराठा नामक समाचार पत्रों द्वारा अपने विचार एवं संदेशों का प्रचार किया। 1896 के दुर्भिक्ष के समय से ही उन्होंने जनता को राजनीति का रहस्य समझाया और भारतीय राजनीति में एक प्रचंड तत्व को सक्रिय कर दिया। तिलक प्रथम कांग्रेसी नेता थे जो देश के लिए अनेक बार जेल गए।

वहीं पहले व्यक्ति थे जिन्होंने स्वराज्य की मांग स्पष्ट रूप से की और नारा दिया कि’ स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।’ यह तिलक और उनके सहयोगियों के प्रयत्नों का फल था कि 1906 कोलकाता कांग्रेस अधिवेशन में स्वशासन, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा की मांग का प्रस्ताव पारित किया गया। 1916 में होमरूल आंदोलन चलाकर उन्होंने राष्ट्रवादी आंदोलन में सामाजिक आधार को विस्तृत बनाया।

प्र 12. भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में एनी बेसेंट का योगदान बताइए।

उत्तर- एनी बेसेंट (1847 – -1933 ईस्वी) आयरिश अंग्रेज महिला थी और थियोसोफिकल सोसायटी का कार्य करने 1895 में भारत आई थी। 1907 में यह संस्था की अध्यक्ष बनी ।1910 से 1933 तक वे सोसायटी की सर्वे सर्वा रही । 1898 में इन्होंने सेंट्रल हिंदू कॉलेज की वाराणसी में स्थापना की। 1914 में इन्होंने कॉमनवील और न्यू इंडिया पत्रों का प्रकाशन आरंभ कर अपने विचारों से लोगों को अवगत कराया।

1916 में इन्होंने होमरूल आंदोलन चलाया। 1917 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में प्रथम महिला कांग्रेस अध्यक्ष बनी। 1917 में ही उन्होंने बालचर संघ और भारतीय महिला संघ की स्थापना की। 1918 में इन्होंने अडियार में राष्ट्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की। उन्होंने भारत की स्वतंत्रता और भारतीय जनमत को जागृत करने के लिए प्रशंसनीय कार्य किए। 1933 में बेसेंट की अडियार में मृत्यु हो गई।

प्र 13. गोपाल कृष्ण गोखले के ब्रिटिश राज के संदर्भ में क्या विचार थे? बताइए।

उत्तर- नौरोजी की तरह गोखले भी उदारवादी नेता थे जो रानाडे के पक्के शिष्य थे। इसलिए ब्रिटिश राज को भगवान का वरदान मानते थे। लेकिन उन्होंने ब्रिटिश राज पर कई गंभीर आरोप लगाए-

1. गोखले ने ब्रिटिश शासन को सफेद नौकरशाही कहा व सुझाव दिया कि जिला स्तर पर प्रमुख लोगों की समितियां होने चाहिए व कलेक्टर उसी की राय से काम करें।

2. गोखले ने कहा कि ब्रिटिश राज का सबसे बड़ा पाप यह है कि इसने भारत के लोगों के दिलों में हीनता का भाव पैदा कर दिया अर्थात उन्हें नैतिक दृष्टि से बौना बना दिया।

3. ब्रिटिश शासन बहुत खर्चीला है जबकि भारत की आर्थिक दशा अच्छी नहीं है। 1897 में इंग्लैंड गये व वेलवी आयोग के सामने अपनी रिपोर्ट रखी व सिद्ध कर दिया कि भारत के 75% लोगों को दिन में एक वक्त रोटी नहीं मिलती जबकि ब्रिटिश अधिकारी मोटे वेतन भत्ते लेते थे।

3. जब 1905 में बंगाल का बंटवारा हुआ तो दिसंबर, 1905 के सम्मेलन में गोखले ने कर्जन को भारत का दूसरा औरंगजेब कह दिया।

5. जब स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन चला तो गोखले ने स्वदेशी आंदोलन का समर्थन किया परंतु बहिष्कार को ठीक नहीं समझा।

प्र 14. सीमांत गांधी का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में क्या योगदान है ? 

उत्तर- उत्तर पश्चिम सीमांत के पेशावर जिले में जन्मे अब्दुल गफ्फार खान ने रौलट एक्ट का विरोध किया और खिलाफत आंदोलन में सक्रियता से भाग लिया। विशिष्ट बात है कि 1930 से 47 ईसवी के दौरान कांग्रेस द्वारा चलाए गए सभी राजनीतिक आंदोलनों में इनकी भूमिका रही।

1929 में इन्होंने ‘खुदाई खिदमतगार’ की स्थापना की एवं पठानों को एकजुट किया और उनमे राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार किया। वे मुस्लिम लीग की कट्टरवादी विचारधारा से कभी सहमत नहीं हुए और धर्मनिरपेक्ष वाद के प्रति कटिबद्ध रहे। यह भारत विभाजन के कट्टर विरोधी थे।

विभाजन के उपरांत उन्होंने पख्तूनिस्तान बनाने का सक्रिय आंदोलन चलाया। पाकिस्तानी प्रशासन ने उन्हें कई बार जेल में बंद रखा। सामान्यतः ये ‘सीमांत गांधी’, ‘बादशाह खान’, फक्र-ए-पाकिस्तान’ के नाम से जाने जाते थे। इन्हें 1987 में भारत सरकार ने भारत रत्न से सम्मानित किया था।

प्र 15. डिकी बर्ड प्लान क्या था ?

उत्तर- डिकी बर्ड प्लान में भारत तथा पाकिस्तान में बंटवारा किस प्रकार हो इस पर एक योजना प्रस्तुत की गई थी। 1946 के अंत तक विभाजन सहित स्वतंत्रता की बात व्यापक रूप से स्वीकार की जाने लगी थी। एक बड़ी और नई बात की डोमिनियन स्टेट्स के आधार पर तुरंत सत्ता का हस्तांतरण हो जिससे नई राजनीतिक संरचनाओं पर पारित नए संविधान सभा पर सहमति होने तक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़े।

पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश और असम के सिलहट जिले में जनमत संग्रह कराने की बात कही गई और सिंध विधानसभा में वोट द्वारा अपने क्षेत्रों से संबंधित निर्णय लेने का अधिकार दिया गया। बंगाल और पंजाब में हिंदू और मुसलमान बहुसंख्यक जिलों के प्रांतीय विधान सभा के सदस्यों की अलग-अलग बैठक बुलाई जाए। उसमें अगर कोई भी पक्ष प्रांत का विभाजन चाहेगा तो विभाजन कर दिया जाएगा।

हैदराबाद के पाकिस्तान के साथ विलय की संभावना को भी नकार दिया गया। इस प्रकार डिकी बर्ड योजना इस समय की परिस्थितियों में भारतीय समस्या को सुलझाने की दिशा में एक यथार्थवादी कदम था।

प्र 16. स्वदेशी आंदोलन पर एक टिप्पणी लिखिए ।

उत्तर- बंगाल विभाजन की योजना के साथ ही बंगाल में स्वदेशी एवं स्वराज की भावना बलवती हो उठी। लार्ड कर्जन के कार्यों का जवाब देने के लिए बंगाल के लोगों के बहिष्कार तथा स्वदेशी का उपयोग इस आंदोलन का मुख्य नारा बन गया। बहिष्कार का मुख्य उद्देश्य पहले ब्रिटिश साम्राज्यवाद पर आर्थिक दबाव डालना था परंतु बाद में इस ने असहयोग का रुख अपना लिया।

इस नए आंदोलन में बंगाल के सभी वर्गों ने भाग लिया लेकिन इसमें छात्रों की महती भूमिका रही। इस आंदोलन को सशक्त बनाने के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवकों को तैयार किया गया तथा जन समितियां बनाई गई। जन समूह को सचेतता प्रदान करने में बारिसाल के पत्र ‘हितैषी’ तथा कोलकाता के ‘संजीवनी’ ने जबरदस्त भूमिका निभाई।

इसके अलावा जगह-जगह सभाओं का आयोजन कर लोगों में बहिष्कार एवं स्वदेशी की भावना को जागृत करने की कोशिश की गई। समाज में विदेशी वस्तुओं का उपयोग करने वालों को नीची निगाहों से देखा जाने लगा तथा उनके साथ असहयोगात्मक रवैया अपनाया जाने लगा।

आंदोलन की व्यापकता को देखते 1905 ई में कांग्रेस ने भी विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी। स्वदेशी आंदोलन को जन समूह का अपार समर्थन दिलाने में रवींद्र नाथ टैगोर, विपिनचंद्र पाल, अरविंद घोष जैसे नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्र 17. स्वतंत्रता के पूर्व एवं स्वतंत्रता के पश्चात भारत में जन आंदोलनों को उद्वेलित करने में जयप्रकाश नारायण के योगदान की विवेचना कीजिए। (निबन्धात्मक)

उत्तर- भारत के समाजवादी नेताओं में जयप्रकाश नारायण का नाम उल्लेखनीय है। उन पर मार्क्सवादी समाजवाद की स्पष्ट छाप देखी जा सकती है क्योंकि जय प्रकाश ने 1948 में कहा कि सोवियत नेता स्टालिन दुनिया का सबसे बड़ा समाजवादी नेता है।

1933 में नासिक जेल में कांग्रेस समाजवादी पार्टी बनाई इसमें अशोक मेहता, युसूफ मेहर अली शामिल थे। 1934 में जेल से छूटने के बाद पटना में इस पार्टी का विशाल अधिवेशन किया जिसकी अध्यक्षता आचार्य नरेंद्र देव ने की। जेपी ने यह कोशिश की कि कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का अध्यक्ष पंडित नेहरू को बनाया जाए परंतु नेहरू ने अध्यक्ष बनने से इंकार कर क्योंकि गांधी जी को यह पसंद नहीं आई थी।

1934 में भारत सरकार ने समाजवादी पार्टी को प्रतिबंधित कर दिया तब बहुत से समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण की कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में आ गए। उन्होंने संयुक्त मोर्चा बना लिया। इन लोगों ने जोर डाला कि कांग्रेस प्रांतों में सरकार न बनाई।

जब कांग्रेस की सरकारें बनी तो कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी वालों ने इसकी कड़ी आलोचना की। जब 1939 में शुरू हुआ तो जय प्रकाश नारायण ने नारा दिया कि ‘ना एक पाई ना एक भाई’। जब गांधी जी ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन चलाया तो जेपी ने उसे बहुत तेज कर दिया।

जब भारत स्वतंत्रता के कगार पर आया तो जय प्रकाश नारायण ने कहा कि किसी भी कीमत पर बंटवारा नहीं होना चाहिए लेकिन नेहरू ने उनका सुझाव नहीं माना। 1948 में गांधी जी की मृत्यु के बाद पटेल ने कहा कि कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी को कांग्रेस में रहने का कोई हक नहीं है।

अतः जय प्रकाश नारायण व उनके साथियों ने कांग्रेस से अलग होकर समाजवादी पार्टी बनाई। जय प्रकाश नारायण इसके अध्यक्ष थे। 1952 के चुनाव में समाजवादी पार्टी बुरी तरह हारी और तभी जयप्रकाश नारायण ने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर विनोबा भावे के अनुयायी होकर पौनार आश्रम चले गए। वहां उन्होंने एक पुस्तक में भारतीय राजव्यवस्था की पुनर्रचना लिखी।

इसमें जयप्रकाश नारायण ने कहा है कि भारत की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था हटा देनी चाहिए और नीचे से ऊपर तक पंचायतें होनी चाहिए। सबसे नीचे ग्राम पंचायत, उनके ऊपर जिला पंचायतें, फिर क्षेत्रीय पंचायतें व सबसे ऊपर राष्ट्रीय पंचायतें हो।

कोई चुनाव ना होना और न पार्टी हो बल्कि सच्चे समाज सेवकों का चयन किया जाना चाहिए जो सभी पंचायतों को चलाएंगे। सभी का जीवन सादा होगा, आवश्यकताएं सीमित होगी और वे संन्यासियों की तरह सार्वजनिक विषयों का प्रबंध करेंगे। इसी का नाम ‘दल हीन लोकतंत्र’ का सिद्धांत है।

चुंकि विनोबा भावे ने भूदान, ग्रामदान, संपत्ति दान, श्रमदान के आंदोलन चलाए इसलिए जय प्रकाश नारायण ने इस आंदोलन में भाग लिया। अतः उन्हें जीवन दानी कहा जाने लगा। लेकिन 1973 में जयप्रकाश नारायण ने पौनार आश्रम छोड़ दिया वह सक्रिय राजनीति में लौट आए।

तब उन्होंने भ्रष्ट कांग्रेस व भ्रष्ट इंदिरा आंदोलन चलाए। गुजरात में युवकों की नव निर्माण समिति बनी जिसके सदस्यों ने विधायकों के जबरदस्ती त्यागपत्र लेने के कारण विधानसभा भंग कर दी। इस स्थिति में इंदिरा ने संविधान में 33 वां संशोधन किया और कहा कि सदन का अध्यक्ष त्यागपत्र तभी स्वीकार करेगा जब वह आश्वस्त हो जाए कि त्यागपत्र स्वयं की इच्छा से दिया है।

1974 में जयप्रकाश प्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया अर्थात 7 क्षेत्रों में आमूलचूल परिवर्तन किया जाएगा। यह क्षेत्र राजनीतिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और कानूनी। स्थिति बिगड़ती चली गई जिससे 25 जून 1975 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर दिया तब जयप्रकाश नारायण व इनके सहयोगी जेल में भेजे गए। तिहाड़ जेल में 1977 में जयप्रकाश नारायण ने जनता पार्टी बनाई।

जेल से छूटने के बाद जयप्रकाश नारायण ने इस पार्टी से 1977 का चुनाव लड़कर बहुत अधिक सफलता पाई। तभी केंद्र में मोरारजी देसाई की सरकार बनी। इसमें चौधरी चरण सिंह व बाबू जगजीवन राम उप प्रधानमंत्री थे। कुछ समय बाद जयप्रकाश नारायण की मृत्यु हो गई परंतु जनता क्रांति के जन्मदाता उन्हीं को कहा जाता है। जयप्रकाश का समाजवाद, संपूर्ण क्रांति, दल हीन लोकतंत्र आज भी प्रसिद्ध है।

प्र 18. केबिनेट मिशन प्लान क्या था? भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग की क्या प्रतिक्रिया रही? (निबन्धात्मक)

उत्तर- द्वितीय महायुद्ध की समाप्ति के पश्चात अंग्रेजी सरकार की स्थिति काफी नाजुक बन चुकी थी। वह किसी भी तरह से भारतीयों को संतुष्ट कर अपना साम्राज्य बनाए रखना चाहती थी। ऐसी विषम स्थितियों में ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने 19 फरवरी 1946 को भारत की समस्या के समाधान हेतु कैबिनेट मिशन को भारत भेजने की घोषणा की।

यह एक महत्वपूर्ण घोषणा थी क्योंकि इसमें पहली बार भारत के लिए स्वाधीन शब्द का प्रयोग किया गया था, साथ ही इस में अल्पसंख्यक एवं बहुसंख्यक दोनों के लिए सुरक्षा की बातें कही गई थी। 24 मार्च 1946 को कैबिनेट मिशन दिल्ली पहुंचा और उसने 16 मई 1946 को व्यापक विचार-विमर्श के पश्चात अपनी योजना प्रस्तुत की। जिसकी प्रमुख बातें निम्नलिखित थी –

  1. ब्रिटिश भारत एवं देशी रियासतों का एक संघ बनाना जिसके हाथों में विदेशी मामले, रक्षा एवं यातायात संबंधी अधिकार हो।
  2. संघीय विषयों के अतिरिक्त सभी विषय प्रांतों के हाथों में रहने चाहिए।
  3. देशी रियासतें संघ को सौपे गए विषयों के अलावा अन्य सभी विषयों पर अपना अधिकार रखेगी।
  4. प्रस्तावित संघ की एक कार्यकारिणी एवं विधायिका होगी जिसमें ब्रिटिश भारत तथा देशी रियासतों के प्रतिनिधि होंगे।
  5. विधानसभा में कुल 389 सदस्य होंगे जिनमें से 292 सदस्यों का चुनाव ब्रिटिश भारत प्रांतों की विधानसभाएं अप्रत्यक्ष तरीके से सांप्रदायिक आधार पर करेगी। शेष 93 सीटों पर देशी रियासतों के प्रतिनिधियों को चुनने का तरीका बाद में तय किया जाएगा।
  6. संविधान के अस्तित्व में आते ही अंग्रेजी सर्वोच्चत्ता समाप्त हो जाएगी। देशी रियासतों को यह अधिकार होगा कि वह संघ से संबंध स्थापित करें अथवा प्रांतों से।
  7. विधानसभाओं को ब्रिटेन के साथ शक्ति हस्तांतरण से उत्पन्न मामलों पर एक संधि भी करनी पड़ेगी।
  8. पाकिस्तान की मांग अव्यावहारिक होने के कारण स्वीकार्य नहीं है।
  9. संविधान निर्माण के पूर्व एक अंतरिम सरकार का गठन किया जाएगा, जिसे प्रमुख राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त होगा।

मुस्लिम लीग ने इसे 6 जून 1946 को तथा कांग्रेस ने 25 जून 1946 को स्वीकार कर लिया। मुस्लिम लीग यद्यपि पाकिस्तान की मांग को अस्वीकार कर दिए जाने से आहत थी। लीग एवं कांग्रेस के बीच इस बात को लेकर विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई कि कैबिनेट मिशन के प्रस्ताव के अनुरूप राज्यों का वर्गीकरण ऐच्छिक होना चाहिए अथवा अनिवार्य। जहां कांग्रेस इसे ऐच्छिक मानने जोर दे रही थी, वही लीग इसे अनिवार्य बनाने पर कायम थी। फिर भी, चुंकि इसने दोनों में आशा की एक नई किरण बिखेर दी थी, अतः उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया।

 

Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

P K Nagauri, महावीर जी कुमावत, रजनी जी तनेजा

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