Rajasthan Bids and Literature : राजस्थान की बोलियां एवं साहित्य कृतियाँ

Rajasthan Bids and Literature

राजस्थानी साहित्य की महत्वपूर्ण कृतियाँ एवं राजस्थान की बोलियाँ

अतिलघुतरात्मक (15 से 20 शब्द)

प्र 1. बागड़ी बोली ?

उत्तर- डूंगरपुर व बांसवाड़ा का सम्मिलित क्षेत्र बागड़ एवं यहां प्रयुक्त बोली बागड़ी है जो मारवाड़ी की उपबोली है। इस पर गुजराती का अधिक प्रभाव है। ग्रियर्सन इसे ‘भीली’ कहते हैं।

प्र 2. अहीरवाटी ?

उत्तर- अहीर वाटी उत्तरी राजस्थान में हीरवाल क्षेत्र, कोटपूतली, बहरोड़, मंडावर के आसपास बोली जाती है। यह हरियाणवी व मेवाती बोली के बीच का संधि स्थल है। इसे राठी भी कहा जाता है।

प्र 3. नैणसी री ख्यात ?

उत्तर- जसवंत सिंह राठौड़ के दरबारी नैणसी द्वारा मारवाड़ी में लिखित प्राचीनतम ख्यात जिसमें राजस्थान का समग्र प्रामाणिक इतिहास दिया गया है। यह तत्कालीन राजस्थान का विस्तृत कोष है।

प्र 4. कन्हैयालाल सेठिया ?

उत्तर- बीसवीं सदी के राजस्थानी एवं हिंदी के आधुनिक कवि कन्हैयालाल सेठिया ने राजस्थानी में पाथल- पीथल वीर रस की अत्यंत प्रसिद्ध व लोकप्रिय कविता की रचना की। धरती धोरां री, अधोरी काल आदि अन्य रचनाएं हैं।

प्र 5. वंश भास्कर ?

उत्तर- उन्नीसवीं सदी के बूंदी के दरबारी कवि सूर्यमल मिश्रण का राजस्थानी भाषा का ग्रंथ वंश भास्कर जिसमें राजपूताने का प्रामाणिक, तथ्यपरक व पद्य बद्ध इतिहास है। आकार व कला सौष्ठव दोनों दृष्टियों से यह राजस्थानी का गौरव ग्रंथ है।

लघूतरात्मक ( 50 से 60 शब्द )

प्र 6. राजस्थान की मुख्य बोलियां।

उत्तर- राजस्थान में 73 बोलियां मानी गई है, जिनमें से 8-10 ही मुख्य है। इनमें मारवाड़ी प्रचार-प्रसार और साहित्यिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है जो पश्चिमी राजस्थान की प्रधान बोली है। तथा मरू प्रदेश में बोली जाती है ।

बागड़ी, मेवाड़ी ,शेखावाटी गोड़वाड़ी आदि इस की प्रमुख उपबोलियां हैं। ढूंढाड़ी पूर्वी राजस्थान की मुख्य बोली है जो जयपुर क्षेत्र में बोली जाती है। हाड़ोती, काठेड़ इसकी प्रधान उपबोलिया है। उत्तरी राजस्थान की मुख्य बोली मेवाती है बृज से प्रभावित है एवं अहीरवाटी हरियाणवी से प्रभावित है। दक्षिणी राजस्थान की मुख्य बोलियां मालवी व निमाड़ी है।

प्र 7. सूर्यमल मिश्रण की साहित्यिक उपलब्धियां।

उत्तर- बूंदी के राजकवि सूर्यमल मिश्रण षट्भाषी, व्याकरण, दर्शन, ज्योतिष आदि शास्त्रों में निष्णात कवि थे। गहन, गंभीर, मार्मिक, भावानुभूति तथा प्रखर प्रांजल अभिव्यक्ति का उत्कृष्ट निदर्शन है महाकवि का काव्य।

वंश भास्कर इन का प्रसिद्ध इतिहास ग्रंथ है एवं वीर सतसई में वीर रस की अतुलनीय व्यंजना है। इन्होंने बलवंत विलास, छंदोमयुख, सती रासो आदि अनेक यशस्वी ग्रंथ लिखे। चरणों के सर्वोत्कृष्ट महा कवि के रूप में प्रतिष्ठित है तथा आधुनिक राजस्थानी काव्य के नवजागरण के पुरोधा कवि थे।

प्र 8. राजस्थानी वेलि साहित्य ?

उत्तर- 15वीं सदी से 19 वी सदी तक प्राकृत एवं अपभ्रंश से मिश्रित राजस्थानी वैलि साहित्य का विकास हुआ। यह लौकिक, जैन एवं ऐतिहासिक प्रकारों में मिलता है जिसकी भाषा डिंगल है। ऐतिहासिक वेलि में राजा महाराजाओं, सामंतों का वीर रस पूर्ण वर्णन, जैन वेलि साहित्य में ऐतिहासिक, कथात्मक उपदेशात्मक वर्णन मिलता है।

पौराणिक धार्मिक वेलि ग्रंथों में काव्य कथा का आधार कृष्ण, विष्णु एवं शिव पुराण रहा है जो श्रृंगार एवं वीर रस पूर्ण है। ‘कृष्ण रुक्मणी री वेलि’ कला पक्ष और प्रकृति चित्रण की दृष्टि से अनुपम ग्रंथ है। वेलि ग्रंथों की संख्या 75 से अधिक है।

प्र 9. राजस्थान की भाषा एवं बोलियों के विकास में डॉक्टर एल पी टैसीटोरी के योगदान का वर्णन कीजिए । (निबन्धात्मक)

उत्तर- सुप्रसिद्ध भाषा शास्त्री डॉक्टर ग्रियर्सन डॉक्टर एल पी टैसीटोरी की विद्वता से काफी प्रभावित थे। डॉक्टर ग्रियर्सन एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ कोलकाता के अधीन राजपूताना के ऐतिहासिक सर्वेक्षण का कार्य टैसीटोरी को सौंपा। टैसीटोरी अपने राजस्थानी साहित्यिक सर्वेक्षण को गति देने के लिए सर्वप्रथम जोधपुर आए। यहां रामकरण ओसापा ने राजस्थानी ग्रंथों के संकलन में एल पी टैसीटोरी की बहुत सहायता की। टैसीटोरी इसके बाद बीकानेर पहुंचे। इटली निवासी डॉ एल पी टैसिटोरी की कार्यस्थली बीकानेर रही।

उनकी मृत्यु 1919 में बीकानेर में ही हुई जहां उनकी कब्र बनी हुई है। बीकानेर महाराजा गंगा सिंह ने उन्हें राजस्थान के चारण साहित्य के सर्वेक्षण एवं संग्रह का कार्य सौंपा था। डॉक्टर टैसीटोरी ने 1914 से 1916 तक ‘इंडियन एंटीक्वेरी’ नामक पत्रिका में माना कि प्राचीन राजस्थानी और गुजराती एक ही भाषा थी। डॉक्टर टैसीटोरी चारणी और ऐतिहासिक हस्तलिखित ग्रंथों की एक सूची विवरणात्मक सूची तैयार की।

इसी दौरान टैसीटोरी की मुलाकात बीकानेर के जैन आचार्य विजय धर्म सूरि से हुई जिनसे उन्होंने अनेक धर्म ग्रंथों का अध्ययन किया। इसी समय उन्होंने अनेक राजस्थानी ग्रंथों का इटालियन में अनुवाद भी किया। अपना कार्य पूरा कर दो ग्रंथ लिखे- पहला राजस्थानी चारण साहित्य एवं ऐतिहासिक सर्वे तथा दूसरा पश्चिमी राजस्थानी का व्याकरण।

टैसीटोरी की प्रसिद्ध पुस्तक ‘ए डिस्किप्टिव कैटलॉग ऑफ बार्डिक एंड हिस्टोरिकल क्रॉनिकल्स’ है। इन्होंने रामचरितमानस, रामायण एवं महाभारत सहित कई भारतीय ग्रंथों का इटालियन भाषा में अनुवाद किया। ‘बेलि कृष्ण रुक्मणी री’ और ‘राव जैतसी रो छंद’ डिंगल भाषा के इन दोनों ग्रंथों का संपादन किया। बीकानेर का प्रसिद्ध दर्शनीय म्यूजियम की स्थापना भी टैसीटोरी ने की।

सरस्वती और दृषद्वती की घाटी की हड़प्पा पूर्व कालीबंगा सभ्यता का खोज कार्य सर्वप्रथम इन्होंने किया। इसके अलावा रंग महल, बड़ोपल रतनगढ़ आदि पुरातात्विक स्थलों की खोज की। डॉ टैसीटोरी के रग रग में राजस्थान एवं राजस्थान के प्रति प्रेम था। उन्होंने डिंगल साहित्य या चारण साहित्य की अमूल्य सेवा की।

 

Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

P K Nagauri