Rajasthan Land Revenue Act ( राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम 1956 )

Rajasthan Land Revenue Act

( राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम 1956 )

 

राजस्थान भू राजस्व अधिनियम 1956 का विस्तार संपूर्ण राजस्थान राज्य में है। इसके तहत भू राजस्व वसूली हेतु राजस्व बोर्ड का गठन किया गया है।

राजस्व बोर्ड का गठन- राजस्व बोर्ड को राजस्व संबंधी विवादों के निपटारे का शीर्षस्थ न्यायालय कहा जा सकता है। राजस्थान में यह बोर्ड अजमेर में स्थित है। 1956 के अधिनियम की धारा 4 से 7 में राजस्व बोर्ड के गठन के बारे में प्रावधान किया गया है ।

इस बोर्ड में एक अध्यक्ष तथा न्यूनतम 3 एवं अधिकतम 15 सदस्यों से मिलकर होता है। राज्य द्वारा अस्थायी तौर पर सदस्यों की संख्या में वृद्धि की जा सकती है।

राजस्व बोर्ड के क्षेत्राधिकार एवं शक्तियां ( Jurisdiction and Powers of Revenue Board )

राजस्थान भू राजस्व अधिनियम 1956 की धारा 8 से 14 तक में राजस्व बोर्ड के क्षेत्राधिकार एवं शक्तियों के बारे में प्रावधान किया गया है हइनके अनुसार-

1. उच्चतम राजस्व न्यायालय-  राजस्व बोर्ड को राज्य में अपील, पुनरीक्षण एवं निर्देशन का उच्चतम राजस्व न्यायालय माना गया है।

2. अधीक्षण की शक्ति – इस अधिनियम के अधीन रहते हुए राजस्व बोर्ड को राज्य के सभी राजस्व न्यायालयों एवं राजस्व अधिकारियोंपर सामान्य अधीक्षण एवं नियंत्रण की शक्तियां प्रदान की गई है।

3. कार्यभार का वितरण एवं प्रशासनिक नियंत्रण – राजस्व बोर्ड के अध्यक्ष को बोर्ड के कार्य के वितरण और संचालन की शक्तियां प्रदान की गई है।

4. अवमान के लिए दंड देने की शक्ति- राजस्व बोर्ड को अवमान के लिए दंडित करने के संबंध में वे ही शक्तियां प्रदान की गई है जो न्यायालय अवमान अधिनियम 1971 के अधीन उच्च न्यायालय को प्राप्त है।

5. वृहत्तर न्याय पीठ को निर्देशित करने की शक्ति- अधिनियम की धारा 11 एवं 15 के अंतर्गत राजस्व बोर्ड की किसी मामले को वृहत्तर न्याय पीठ को निर्देशित करने की शक्ति का उल्लेख किया गया है।

इन के अनुसार बोर्ड का अध्यक्ष या सदस्य या न्याय पीठ यदि ठीक समझे तो कारण लेखबद्ध करते हुए अपने समक्ष के किसी मामले या कार्यवाही में उद्भूत होने वाले विधि के या विधि का बल रखने वाली प्रथा के या किसी भी दस्तावेज के अर्थान्वयन के किसी भी प्रश्न को राय के लिए वृहत्तर न्याय पीठ को निर्देशित कर सकेगी और मामला या कार्यवाही ऐसी राय के अनुसार निपटाए जाएगी।

6. उच्च न्यायालय – राजस्थान भू राजस्व अधिनियम की धारा 12 में यह प्रावधान किया गया है कि जहा मामले में यह प्रतीत हो कि उसमें विधि का कोई प्रश्न अंतर्ग्रस्त है जो सार्वजनिक महत्व का है और उस पर उच्च न्यायालय की राय प्राप्त करना समीचीन है तो न्याय पीठ द्वारा ऐसे प्रश्न को राय हेतु उच्च न्यायालय को निर्देशित किया जा सकेगा।

7. मतभेद की दशा में विनिश्चय – राजस्थान भू राजस्व अधिनियम 1956 में यह अपबंधित किया गया है कि बोर्ड द्वारा अपनी अपीलीय, पुनरीक्षण या निर्देशन संबंधी अधिकारिता का प्रयोग अध्यक्ष द्वारा नियुक्त किया कया गठित किसी भी खंडपीठ द्वारा किया जा सकेगा।

यदि खंडन्यायपीठ दो या अधिक सदस्यों से बनी है और सदस्य विधि के किसी भी प्रश्न पर दिए जाने वाले विनिश्चय के बारे में राय में बंटे हुए हो तो ऐसे प्रश्न का विनिश्चय सदस्यों के बहुमत से किया जाएगा।

यदि राय के बारे में सदस्य समान रूप से बंटे हुए हो तो मामला किसी अन्य सदस्य या सदस्यों को निर्दिष्ट किया जाएगा और ऐसे सदस्यों को जिन्होंने इसे सुना था सम्मिलित करते हुए सदस्यों के बहुमत के अनुसार विनिश्चिय किया जाएगा।

यहां यह उल्लेखनीय है कि खंडपीठ के विनिश्चय के विरूद्ध कोई अपील नहीं हो सकेगी।

8. नियम बनाने की शक्ति- राजस्व बोर्ड की बैठकों और पद्धति को विनियमित करने, प्रारूप का उपबंध करने के लिए, फीसोंकी सारणीयां तय करने के लिए नियम बनाने की शक्तियां प्रदान की गई है।

9. अन्य शक्तियां – राजस्व बोर्ड द्वारा ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग एवं कृत्यों का निर्वहन किया जाएगा जो समय-समय पर –

  1. राज्य सरकार द्वारा उसे सौंपे जाए, या
  2. इस अधिनियम के द्वारा या अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी भी अन्य विधि द्वारा बोर्ड को प्रदत किए जाये या उस पर अधिरोपित किए जाए।

राजस्व न्यायालय ( Revenue court )

राजस्व संबंधी विवादों के निपटारे हेतु राजस्थान भू राजस्व अधिनियम 1956 में राजस्व न्यायालय के गठन की व्यवस्था की गई है। राजस्थान भू राजस्व अधिनियम 1956 की धारा 17 से 22 तक में निम्नांकित राजस्व न्यायालयों एवं अधिकारियों का उल्लेख किया गया है-

  1. आयुक्त
  2. उपायुक्त
  3. बंदोबस्त आयुक्त
  4. अपर बंदोबस्त आयुक्त
  5. भू अभिलेख निदेशक
  6. अपर भू-अभिलेख निदेशक
  7. कलेक्टर एवं भू अभिलेख अधिकारी
  8. तहसीलदार एवं अपर भू अभिलेख अधिकारी
  9. बंदोबस्त अधिकारी
  10. सहायक कलेक्टर
  11. नायब तहसीलदार
  12. राजस्व अपील अधिकारी नियंत्रण 

नियंत्रण – सन 1956 के अधिनियम के अंतर्गत बंदोबस्त संबंधित मामलों का नियंत्रण बोर्ड में निहित माना गया है।

राजस्थान भू राजस्व अधिनियम 1956 की धारा 23 (1) के अनुसार- भू अभिलेख से संसक्त मामलों से भिन्न, राज्य में लगान एवं राजस्व से संसक्त समस्त न्यायिकेतर मामलों का नियंत्रण राज्य सरकार में निहित है तथा समस्त न्यायिक मामलों तथा भू अभिलेख से संसक्त समस्त मामलों का नियंत्रण राजस्व बोर्ड में निहित है।

राजस्व अपील अधिकारी

राजस्थान भू राजस्व अधिनियम 1956 की धारा 20(क) के अंतर्गत राजस्व अपील अधिकारी के बारे में प्रावधान किया गया है। राजस्व अधिकारियों की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की जाएगी और ऐसे अधिकारियों को राजस्व अपील प्राधिकारी के नाम से पदाभिहित किया जाएगा।

राजस्व अपील प्राधिकारी को राजस्व संबंधी न्यायिक मामलों और विधि द्वारा विनिर्दिष्ट रूप से उपबंधित अन्य मामलों में –

  1. अपीलों
  2. पुनरीक्षणों एवं
  3. निर्देशों को ग्रहण करने सुनने एवं उसका निस्तारण करने की अधिकारिता होगी।

वे आदेश जिनके विरुद्ध अपील नहीं हो सकती-

राजस्थान भू राजस्व अधिनियम 1956 की धारा 77 में उन आदेशों का उल्लेख किया गया है जिनके विरुद्ध अपील नहीं हो सकती। यह आदेश निम्नांकित है-

  1. परिसीमा अधिनियम 1963 की धारा 5 में विनिर्दिष्ट आधारों पर पुनर्विलोकन के लिए किसी अपील या आवेदन को ग्रहण करने के आदेश की,
  2. पुनरीक्षण या पुनर्विलोकन के लिए किसी आवेदन को नामंजूर करने के आदेश की,
  3. ऐसे आदेश की जो इस अधिनियम द्वारा अभिव्यक्त रूप से अंतिम घोषित कर दिया गया है तथा,
  4. अंतरिम आदेश की

सीमाएं ( Limitations )

राजस्थान भू राजस्व अधिनियम की धारा 78 में अपील के लिए निम्नांकित परिसीमा निर्धारित की गई है-

  1. आदेश की तारीख से 30 दिन के भीतर कलेक्टर या भू अभिलेख अधिकारी या बंदोबस्त अधिकारी को,
  2. आदेश की तारीख से 7 दिन के भीतर राजस्व अपील प्राधिकारी या बंदोबस्त आयुक्त या भू अभिलेख निदेशक को, तथा
  3. आदेश की तारीख से 90 दिन के भीतर राजस्व बोर्ड को अपील की जा सकेगी, उसके पश्चात नहीं।

सर्वेक्षण एवं अभिलेख प्रवर्तन के दौरान मुख्य रूप से निम्नांकित कार्य संपन्न किए जाते हैं –

  1. सीमा चिन्ह लगाना
  2. सर्वेक्षण संख्याओं एवं गांवों का बनाया जाना।
  3. खेतों का नक्शा एवं रजिस्टर तैयार करना
  4. अधिकार अभिलेख तैयार करना।

धारा 96 में कहा गया है कि भूमि अभिलेख अधिकारी द्वारा इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए और सरकार द्वारा तद्निमित बनाए गए नियमों के अनुसार सर्वेक्षण संक्रियाओं के अधीन क प्रत्येक क्षेत्र के संबंध में प्रत्येक गांव या उसके भाग के लिए नक्शे और नक्शे के निर्देश से प्रत्येक सर्वेक्षणों संख्या के क्षेत्र को दर्शित करते हुए, खेतों का एक रजिस्टर तैयार करेगा, जिसे खसरा कहा जाता है।

ऐसे खेतों के रजिस्टर या खसरे में निम्नांकित विशिष्टियां होगी –

  • अभिधारी का नाम,
  • अभिधारी की धृति की प्रकृति एवं वर्ग,
  • खेत का क्षेत्र,
  • सिंचाई के स्रोत उसके ढंग सहित और मृदा वर्ग,
  • वर्तमान और पुरानी खसरा संख्या जिसमें उसका अपने क्षेत्र सम्मिलित है, तथा
  • ऐसी अन्य विशेष्टियां जो निदेशक, भू-अभिलेख द्वारा समय समय पर विहित की जाए।

नामान्तरण ( Convertion )

इसका शाब्दिक अर्थ है नाम का अंतरण। जब कोई भूमि अंतरण द्वारा अथवा उत्तराधिकार द्वारा किसी अन्य व्यक्ति को अंतरित कर दी जाती है तब अंतरक के स्थान पर अंतरिति का नाम दर्ज कर लिया जाता है। नाम बदलने की इस कार्यवाही को ही नामांतरण की कार्यवाही कहा जाता है।

नामांतरण का मुख्य उद्देश्य होता है राजस्व अथवा लगान के संदाय का दायित्व निर्धारित करना।

जब संपत्ति एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को अंतरित हो जाती है तो यह स्वाभाविक है कि राजस्व अथवा लगान का दायित्व भी अंतरिति पर आ जाना चाहिए और यही सुनिश्चित करने के लिए नामांतरण की कार्यवाही की जाती है।

प्रक्रिया- राजस्थान भू राजस्व अधिनियम 1956 की धारा 133 से 135 तक में नामांतरण की प्रक्रिया के बारे में प्रावधान किया गया है।

 

Specially thanks to Post Writer ( With Regards )

P K Nagauri