Rajasthan Lok Devta Question

Rajasthan Lok Devta Question

राजस्थान के संत एवं लोकदेवता

अतिलघुतरात्मक (15 से 20 शब्द)

प्र 1. निम्बार्क संप्रदाय ?

उत्तर- 16वीं सदी में निंबार्काचार्य द्वारा प्रसारित वैष्णव धर्म में कृष्ण भक्ति की एक शाखा, निंबार्क संप्रदाय की राजस्थान में स्थापना परशुराम देवाचार्य ने सलेमाबाद (किशनगढ़) में की जिसमें युगल स्वरूप (राधा कृष्ण) की मधुर सेवा की जाती है।

प्र 2. संत पीपाजी ?

उत्तर- गागरोन के खींची राजपूत एवं रामानंद के शिष्य संत पीपा ने निर्गुण भक्ति, गुरु कृपा से मोक्ष का प्रसार एवं भेदभाव का विरोध कर राजस्थान में भक्ति परंपरा का मार्ग प्रशस्त किया।

प्र 3. संत गवरी बाई ?

उत्तर- ‘बागड़ की मीरा’ के नाम से प्रसिद्ध संत गवरी बाई ने भी कृष्ण को पति रूप में स्वीकार कर कृष्ण भक्ति की थी। डूंगरपुर के महारावल शिव सिंह ने गवरी बाई के प्रति श्रद्धा स्वरूप बालमुकुंद मंदिर का निर्माण करवाया था। गवरी बाई ने अपनी भक्ति में हृदय की शुद्धता पर बल दिया था।

प्र 4. पाबूजी ?

उत्तर- मारवाड़ के पंच पीरों में प्रमुख जोधपुर के पाबूजी राठौड़ ने गो रक्षार्थ प्राण न्योछावर कर देवत्व प्राप्त किया। इनकी प्लेग रक्षक एवं ऊंटों के रक्षक देवता के रूप में विशेष मान्यता है।

प्र 5. आवड़ देवी ?

उत्तर- आवड देवी का ही एक रूप स्वांगिया माता भी है जो जैसलमेर के निकट विराजमान है। यह जैसलमेर के भाटी राजाओं की कुलदेवी मानी जाती हैजैसलमेर के राजचिन्ह में सबसे ऊपर पालम चिड़िया देवी का प्रतीक है।

लघूतरात्मक ( 50 से 60 शब्द )

प्र 6. संत जांभोजी ।

उत्तर- 15वीं सदी के पीपासर (नागौर) के पंवार वंशीय राजपूत लोहट जी एवं हंसा देवी के पुत्र जांभोजी पंवार ने निर्गुण भक्ति परंपरा की एक शाखा स्थापित कर बीस+ नो(29) नियमों का प्रतिपादन किया। जिनके अनुसरण करने वाले बिश्नोई कहलाए। उनके उपदेश सबदवाणी, जंभ सागर आदि ग्रंथों में संग्रहित है ।

उन्होंने उस युग की सांप्रदायिक संकीर्णता, प्रथाओं, कुरीतियों अंधविश्वासों, नैतिक पतन के वातावरण से सामाजिक दशा सुधारने एवम आत्मबोध द्वारा कल्याण के मार्ग को अपनाया। पशु एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए यह संप्रदाय विशेष रूप से जाना जाता है। पश्चिमी राजस्थान में जाट समुदाय में इसका प्रभाव अधिक है।

प्र 7. देवनारायण जी ।

उत्तर- राजस्थान के प्रमुख लोक देवता देवनारायण जी का जन्म तेरहवीं सदी में नागवंशी गुर्जर बगड़ावत परिवार में सवाई भोज के घर में हुआ।इन्हें अपने शौर्य पूर्ण एवं चमत्कारिक कृत्यों के कारण विष्णु का अवतार स्वीकार किया गया। यह आयुर्वेद के ज्ञाता थे। भाद्रपद चतुर्थी को इनकी जगह जगह पूजा की जाती है।

देवमाली, आसींद सहित अनेक स्थलों पर इनके नाम का मेला भरना इस लोक देवता की लोकप्रियता का प्रमाण है जहां लाखों की संख्या में नर-नारी एकत्रित होकर अपने अपने दुखों से संताप पाते हैं।

प्र 8. बाबा रामदेव ?

उत्तर- मारवाड़ के पंच पीरों में सर्व प्रमुख रामदेव जी तंवर राजस्थान के प्रमुख लोक देवता है। यह अपने अलौकिक कृत्यों से पीर की तरह पूजे जाने लगे। यह एक वीर योद्धा, सिद्ध पुरुष, कर्तव्य परायण, जन सामान्य एवं गो के रक्षक के रूप में प्रसिद्ध है। रामदेव जी ने सामाजिक समरसता, सांप्रदायिक सौहार्द, गुरु महिमा एवं अहिंसा को प्रमुखता दी।

उन्होंने जाति पांति छुआछूत ऊंच-नीच के भेदभाव का विरोध कर निम्न जातियों को गले लगाया। धर्मांतरण को रोककर इन्होंने इन निम्न जातियों को हिंदू धर्म एवं समाज में बांधे रखने का क्रांतिकारी कार्य किया। रामदेवरा (रुणेचा) में इनका विशाल मंदिर है जहां भाद्रपद में इनका विशाल मेला लगता है। यह सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक है।

प्र 9. राजस्थान के प्रमुख लोक देवताओं का राज्य की सामाजिक-सांस्कृतिक प्रगति में योगदान बताइए । (निबन्धात्मक)

उत्तर- समय-समय पर उत्कृष्ट कार्य, बलिदान, उत्सर्ग एवं परोपकार करने वाले महापुरुष लोक देवता के रूप में पूजनीय हुए। राजस्थान में ऐसे लोकदेवताओं में बाड़मेर – जैसलमेर के रामदेव जी तंवर, जोधपुर के पाबूजी राठौड़, चूरू के गोगा जी चौहान, नागौर के तेजाजी जाट, आसींद के देव नारायण जी गुर्जर, मारवाड़ के कल्ला जी राठौड़ एवं अन्य अनेक लोक देवता हुए जिन्होंने अपने आत्मोत्सर्ग द्वारा सादा व सदा सदाचारी जीवन बिताने के कारण अमरत्व प्राप्त किया। इन्होंने राजस्थान की सामाजिक सांस्कृतिक प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसे निम्नलिखित बिंदुओं के तहत स्पष्ट किया जा सकता है-

1. सामाजिक सुधारक के रूप में – सभी लोग देवताओं ने अस्पृश्यता, जाति पांति, छुआछूत, ऊंच नीच का भेदभाव आदि बुराइयों का निराकरण कर निम्न वर्ग के स्तर को ऊंचा उठाने का प्रयास किया।

2. कष्टों के निवारक के रूप में- इन्होंने बांझ को पुत्र, अंधे को आंख, लुले को पैर, कोढी को स्वस्थ्यता प्रदान की। लोक आस्था से सरोबार समाज अपने कष्टों की व्यथा, कंथा को इनके स्थान एवं चित्रों के सामने सुना कर जाण पाते हैं।

3. आपसी मेल मिलाप एवं समरसता को बढ़ावा – लोक देवों के स्थान पर लगने वाले मेलों में विभिन्न क्षेत्रों एवं वर्गों के लाखों लोग मिलते हैं, जिससे उनमें आपसी मेल मिलाप, पारस्परिक सौहार्द उत्पन्न होता है क्योंकि इन लोकदेवों ने सभी जातियों को बिना भेदभाव के एक साथ समरसता पूर्वक रहने का संदेश दिया था।

4. उद्धारकर्ता एवं संस्कृति के संरक्षक के रूप में – इन लोक देवताओं ने आतताइयों के अत्याचारों से देश, धर्म, गाय, ब्राह्मण एवं मातृभूमि की रक्षा कर धर्म का पालन कर इसे अक्षुण्ण रखा। बाहरी आक्रमणकारियों से हमारी संस्कृति को दूषित होने से बचाया।

5. सांस्कृतिक मूल्यों को बढ़ावा –  इन्होंने आत्मज्ञान, साधना, आत्म कल्याण, त्याग, सत्य, निष्ठा, ईमानदारी, कर्तव्य परायणता, न्याय, सद् मार्ग की प्रेरणा आदि उच्च सांस्कृतिक आदर्शों का पालन कर एवं बोलचाल की भाषा में व्यक्त कर लोगों को इन मूल्यों को मानने के लिए प्रेरित किया।

6. भक्ति भावना के विकास में योगदान –  उन्होंने तत्कालीन राजस्थान की अशिक्षित, खेतीहर एवं निम्न जातियों में नवीन भक्ति भावना को प्रतिष्ठित किया। लोग गांव-गांव में इनके देवरे, मंदिर आदि बनाकर सहज भक्ति भाव से उन्हें पूजने लगे।

7. एकता, ध्यान व नैतिक मूल्यों के विकास में योगदान – लोकदेवों में विश्वास के कारण ग्रामीण जनता ने संस्कृति के मूल मंत्र एकता, ध्यान और नैतिक मूल्यों को समझने में सफलता प्राप्त की।

8. समाज को एक सूत्रता में बंधे रहने की प्रेरणा-  इन लोक देवताओं में लोगों का अधिक लगाव होने के कारण इनके अनुयायी एक स्थान पर एकत्रित होते हैं जो अपने आप को एक समाज का अंग मानकर एकता का अनुभव करते हैं।

9. लोक साहित्य के विकास में योगदान  – अनेक लोक देवता कवि भी हुए जिन्होंने अपने धर्मोपदेश ग्रन्थ लिखे। बाद के साहित्यकारों /अनुयायियों ने इनकी गाथाओं से भरपूर लोक साहित्य की रचना कर राजस्थान के लोक साहित्य को समृद्ध किया।

10. लोक स्थापत्य कला के विकास में योगदान- राजस्थान में एक भी ऐसा गांव या शहर नहीं है जहां इन लोक देवताओं के छोटे- बड़े एवं विशाल मंदिर या देवरे न हो जिसने लोक स्थापत्य के साथ-साथ राजस्थान की स्थापत्य कला को समृद्ध किया है।

11. लोकगीतों के विकास में योगदान – राजस्थान के लोकगीतों में राजस्थान के लोक देवताओं के शौर्य एवं चमत्कारिक कार्यों से संबंधित अनेक लोकगीत भरे पड़े हैं जो सर्वत्र ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी गाए जाते हैं।

12. चित्रकला एवं मूर्तिकला आदि के विकास में योगदान।

इस प्रकार इनकी प्रेरणा से लोगों को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिली। इससे सामाजिक जीवन सुसंगठित हुआ और आचारगत विशेषताओं की व्यवहारिकता के पालन हेतु लोग जागरुक रहने लगे। इस प्रकार लोक देवताओं_ देवियों ने यहां के सामाजिक, धार्मिक, नैतिक जीवन को न केवल प्रभावित किया बल्कि एक नवीन दिशा भी दी जो उस समय की आवश्यकताओं के अनुरूप थी।

 

Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

P K Nagauri

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