Social and Religious Reform Movement सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आन्दोलन

Social and Religious Reform Movement

19-20 वीं सदी में सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आन्दोलन

अतिलघुतरात्मक (15 से 20 शब्द)

प्र 1. तत्वबोधिनी सभा ?

उत्तर- देवेंद्र नाथ टैगोर द्वारा 1839 में ब्रह्म समाज की एक शाखा के रूप में तत्वबोधिनी सभा की स्थापना की, जिसका अध्यक्ष आचार्य केशव चंद्र सेन को नियुक्त किया। सेन ने इसकी शाखाएं बंगाल से बाहर उत्तर प्रदेश, पंजाब, मद्रास में स्थापित की।

प्र 2. वहाबी आंदोलन ?

उत्तर- वहाबी आंदोलन 18वीं शताब्दी के प्रथम भाग में अरब निवासी अब्दुल वहाब के नेतृत्व में हुआ। इस आंदोलन का प्रचार-प्रसार रायबरेली के सैयद अहमद ने किया। यह आंदोलन भारत में पुनः मुस्लिम राज्य स्थापित करना चाहता था।

प्र 3. सत्यशोधक समाज ?

उत्तर- सत्यशोधक समाज की स्थापना ज्योतिबा फुले द्वारा 1873 में की गई। इस समाज के अधिकांश नेताओं का संबंध समाज के निम्न वर्गों से था खासकर माली, तेली, कुनबी आदि। जाति प्रथा का विरोध तथा सामाजिक समानता पर बल देना इस आंदोलन का प्रमुख लक्ष्य था।

प्र 4. अलीगढ़ आंदोलन ?

उत्तर- यह मुस्लिम समाज सुधार आंदोलन था, जिसके प्रणेता सर सैयद अहमद खान थे। जो कार्य हिंदुओं के लिए राजा राममोहन राय ने किया वही कार्य मुसलमानों के लिए सर सैयद अहमद खान ने किया।

प्र 5. रहनुमाई माजदयासन समाज ?

उत्तर- पारसी समाज सुधार के लिए नौरोजी फरदोन जी तथा दादा भाई नौरोजी द्वारा रहनुमाई माजदियासन समाज की स्थापना 1851 में मुंबई में की गई। पारसी समाज की महिलाओं की दशा में सुधार करना इसका प्रमुख उद्देश्य था।

प्र 6. ब्रह्म समाज ?

उत्तर-1828 में राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित ब्रह्म समाज एक सामाजिक धार्मिक आंदोलन था, जिसका मुख्य उद्देश्य भिन्न भिन्न धार्मिक आस्थाओं में बंटी हुई जनता को एकजुट करना और समाज मे व्याप्त कुरूतियों को दूर करना।

प्र 7. भारतीय सेवक समाज ?

उत्तर- गोपाल कृष्ण गोखले ने मुंबई में 1905 में भारतीय सेवक समाज की स्थापना की, जो एक समाज सुधारक संस्था थी। इसके अन्य सदस्य श्रीनिवास शास्त्री, हृदयनाथ कुंजरू, एन एम जोशी थे।

प्र 8. अहमदिया आंदोलन ?

उत्तर- मिर्जा गुलाम अहमद ने 1889 में एक आंदोलन शुरू किया जो उन्हीं के नाम पर अहमदिया आंदोलन कहलाया उन्होंने स्वयं को हजरत मुहम्मद के समकक्ष कहा तथा इस्लाम का मसीहा बताया। बाद में यह अपने आप को कृष्ण का अवतार कहने लगा।

प्र 9. शारदा अधिनियम ?

उत्तर- श्री हरविलास शारदा के प्रयासों से बाल विवाह को रोकने के लिए 1929 में शारदा एक्ट बना, जिसके द्वारा विवाह की न्यूनतम आयु सीमा बढ़ाकर बाल विवाह पर रोक लगाने की कोशिश की गई।

प्र 10. भारत में पुनर्जागरण के जनक के नाम से कौन जाना जाता है?

उत्तर- राज् राममोहन राय का जन्म 1772 में राधा नगर, हुगली (बंगाल) में एक संभ्रांत ब्राह्मण परिवार में हुआ। राजा राम मोहन राय को ‘आधुनिक भारत का पिता’, ‘भारतीय राष्ट्रवाद का जनक’, ‘पुनर्जागरण के जनक’, ‘भोर का तारा’, ‘प्रथम समाज सुधारक’ कहा जाता है।

लघूतरात्मक ( 50 से 60 शब्द )

प्र 11. 19वीं – 20वीं सदी के सामाजिक सुधार आंदोलनों के दौरान हुए सामाजिक सुधारों की एक सूची बनाइए।

उत्तर- 19वीं – 20वीं सदी के सामाजिक सुधार आंदोलनों के दौरान निम्नलिखित सामाजिक सुधार हुए-

शिशु हत्या पर प्रतिबंध लगाने के लिए 1795 में गवर्नर जनरल वैलेजली द्वारा शिशु वध प्रतिबंध अधिनियम पारित किया। सती प्रथा पर प्रतिबंध के लिए लॉर्ड विलियम बेंटिक द्वारा 1829 में सती प्रथा प्रतिबंध अधिनियम पारित किया गया। दास प्रथा पर प्रतिबंध के लिए 1823 में एलनबरो द्वारा अधिनियम पारित किया गया।

विधवा विवाह की अनुमति के लिए लॉर्ड डलहौजी द्वारा 1856 में हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित किया गया। अंतर्जातीय विवाह के लिए नेटिव मैरिज एक्ट 1872 नार्थब्रुक द्वारा, विवाह की आयु लड़की के लिए 12 वर्ष करने हेतु 1893 में लैंसडाउन द्वारा एज ऑफ कंसेंट एक्ट तथा विवाह की आयु 18 वर्ष लड़के के लिए निर्धारित करने हेतु इरविन द्वारा 1930 में शारदा एक्ट पारित किया गया।

प्र 12. ज्योतिराव गोविंदराव फुले।

उत्तर- ज्योतिबा फुले के नाम से प्रसिद्ध 19वीं शताब्दी के एक महान भारतीय विचारक, समाजसेवी, लेखक, दार्शनिक तथा क्रांतिकारी कार्यकर्ता के रूप में ज्योतिबा राव गोविंदराव फुले का नाम प्रसिद्ध है। सितंबर 18 73 में इन्होंने महाराष्ट्र में सत्यशोधक समाज नामक संस्था का गठन किया। महिलाओं व दलितों के उत्थान के लिए इन्होंने अनेक कार्य किए।

समाज के सभी वर्गों को शिक्षा प्रदान करने के समर्थक थे और विशेष रूप से स्त्री शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। ज्योतिबा फूले ने महात्मा बुद्ध व कबीर के क्रांतिकारी विचारों को समन्वित किया।

प्र 13. प्रार्थना समाज ?

उत्तर- आत्माराम पांडुरंग, महा गोविंद रानाडे द्वारा 1867 में मुंबई में ब्रह्म समाज की एक शाखा के रूप में प्रार्थना समाज की स्थापना की। आर जी भंडारकर, एम जी चंद्रवाकर इसके अन्य प्रमुख नेता थे। प्रार्थना समाज के चार उद्देश्य थे-

  1. जाति पाति का विरोध।
  2. विवाह की आयु बढ़ाना।
  3. विधवा विवाह पर जोर।
  4. स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देना।

इस समाज द्वारा स्थापित अन्य संस्थाएं –

  1. सोशल सर्विस लीग,
  2. दलित जाति मंडल,
  3. आर्य महिला समाज,
  4. सेवा सदन,
  5. विधवा आश्रम संघ आदि थी

प्र 14. धार्मिक एवं सामाजिक सुधारों के क्षेत्र में राजा राम मोहन राय का योगदान बताइए।

उत्तर- राजा राममोहन राय एक महान समाज सुधारक व धर्म सुधारक थे। बहु भाषाविद् होने के कारण उन्होंने अनेक धर्मों का अध्ययन किया और बताया कि सभी धर्मों में एकेश्वरवादी सिद्धांत का प्रचलन है। उन्होंने 1828 में ब्रह्म समाज नामक संस्था की स्थापना की। वे धार्मिक स्वतंत्रता और सहिष्णुता के पुजारी थे।

उन्होंने अंधविश्वास, मूर्ति पूजा, धार्मिक कर्मकांड आदि की निंदा की। सामाजिक सुधारों के क्षेत्र में उन्होंने स्त्रियों की दशा सुधारने की ओर पर्याप्त ध्यान दिया। उनके प्रयत्नों के फलस्वरूप ही 1829 में बैंटिक ने कानून बनाकर सती प्रथा को अवैध घोषित कर दिया। औरतों को पैतृक संपत्ति में अधिकार दिलाना चाहते थे।

वह विधवा विवाह के समर्थन एवं बहु विवाह के विरोधी थे। स्त्री शिक्षा के घोर समर्थक थे। उन्होंने जातिवाद पर भी प्रत्यक्ष प्रहार किया। निसंदेह धार्मिक एवं सामाजिक सुधारों के क्षेत्र में राजा राममोहन राय का नाम सर्वोपरि है।

प्र 15. थियोसोफिकल सोसायटी।

उत्तर- रूसी मैडम ब्लॉवस्टकी तथा अमेरिकी हैनरी ऑलकॉट के द्वारा थियोसोफिकल सोसायटी की स्थापना अडियार( मद्रास) में 1882 में की। इस समिति का मुख्य उद्देश्य धर्म को समाज सेवा का आधार बनाना व धार्मिक भ्रातृत्व भाव का प्रचार प्रसार करना था। सोसायटी पुनर्जन्म एवं कर्म के सिद्धांत को स्वीकार करती थी।

यह अपनी प्रेरणा का मुख्य स्रोत सांख्य दर्शन एवं वेदांत को मानती थी। उन्होंने हिंदू एवं बौद्ध धर्म को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। इसने भारतीयों में राष्ट्रीय गौरव की भावना को विकसित किया। 1882 में मद्रास के निकट अडियार में थियोसोफिकल सोसायटी का मुख्यालय बनाने के बाद भारत में थियोसोफिकल आंदोलन का विकास हुआ, जिसे बाद में एनी बेसेंट ने आगे बढ़ाया।

16. 19वीं शताब्दी में सामाजिक धार्मिक सुधारों का क्या स्वरूप था और उन सुधारों ने भारतीय राष्ट्रीय जागरण में किस प्रकार योगदान किया था? (निबन्धात्मक)

उत्तर- 19वीं शताब्दी में लगभग सभी भारतीय धर्मों में सुधार की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी थी। तत्कालीन भारतीय सामाजिक व्यवस्था अन्योन्याश्रित रूप से धर्म से जुड़ी थी। धर्म सुधार एवं समाज सुधार बहुत हद तक एक दूसरे के पर्याय थे।

इस समय हिंदू धर्म में ब्रह्म समाज एवं आर्य समाज, मुस्लिम धर्म के अंतर्गत अलीगढ़ एवं अहमदिया आंदोलन, सिख धर्म में अकाली आंदोलन एवं पारसी धर्म के अंतर्गत रहनुमाई मजदियासन सभा जैसे धार्मिक सामाजिक सुधारक आंदोलनों ने जन्म लिया। लगभग सभी सुधारक विज्ञान तथा विवेकशीलता और मानवतावाद के सिद्धांत से प्रभावित थे किंतु स्वरूप की दृष्टि से इन आंदोलनों में भी थोड़ा बहुत फर्क था।

कुछ सुधारको की अतीत पर निर्भरता अधिक थी तो कुछ विचारकों पर पाश्चात्य चिंतन का प्रभाव अधिक था। उदाहरणार्थ आर्य समाज, थियोसॉफिस्टों वहाबियों आदि की अतीत पर निर्भरता अधिक थी तो ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज एवं रहनुमाई मजदियासन सभी पाश्चात्य चिंतन से अधिक प्रभावित थे।

यह आंदोलन शहरी मध्यम एवं उच्च वर्ग से जुड़ा हुआ था जिसके अंतर्गत तर्कबुद्धिवाद एवं धार्मिक सार्वभौमवाद पर जोर देते हुए सामाजिक प्रथाओं में सुधार एवं आधुनिकीकरण पर जोर दिया गया। साथ ही, सांस्कृतिक विरासत के धार्मिक एवं दार्शनिक पहलू पर विशेष जोर दिया गया जबकि कला, वास्तु कला, संगीत कला, विज्ञान- प्रौद्योगिकी आदि अपेक्षाकृत कम लाभान्वित हुए।

भारतीय राष्ट्रीय जागरण में योगदान –  सामाजिक धार्मिक सुधारों ने आधुनिक राष्ट्रीय जागरण में अग्रिम भूमिका निभाई। सामाजिक – धार्मिक नेताओं ने भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का अन्वेषण किया। उन्होंने विभिन्न प्रकार के सामाजिक- धार्मिक आडंबर पर चोट कर आधुनिक भारत की सामाजिक शक्ति को मजबूत किया।

इन आंदोलनों ने भारतीयों को आधुनिक राजनीतिक विचारधारा एवं स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व के उदात विचारों से अवगत कराया। इन सब से जनता में मानवतावादी नैतिकता का प्रचार हुआ एवं राजनीतिक स्वतंत्रता तथा आधुनिक विकास की भावनाओं का प्रसार हुआ। दयानंद सरस्वती एवं विवेकानंद के स्वदेशी एवं स्वावलंबन जैसे नारों ने लोगों में एक नई चेतना का प्रसार किया।

स्वाभाविक रूप से सामाजिक धार्मिक सुधारों ने राष्ट्रीय जागरण हेतु आधारभूमि तैयार करने में अहम भूमिका निभाई।

प्र 17. राष्ट्रीय चेतना के विकास में स्वामी विवेकानंद की भूमिका पर संक्षिप्त रूप से विचार कीजिए।

उत्तर- रामकृष्ण मिशन 19वीं शताब्दी का एक धार्मिक सामाजिक सुधार आंदोलन था।मिशन की स्थापना स्वामी विवेकानंद ने 1897 में अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के नाम पर की थी। 1899 में उनके द्वारा बेलूर मठ को स्थापित किया गया। भारत तथा हिंदू धर्म के अध्यात्मवाद से पश्चिम जगत को परिचित कराने का श्रेय स्वामी विवेकानंद को ही जाता है।

स्वामी विवेकानंद ने प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष दोनों ही रूपों में राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने में योगदान दिया। ‘भारत का सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक इतिहास’ के लेखकों के शब्दों में ” वे नए भारत के नव चेतना के प्रतीक थे। उन्होंने नैतिक राष्ट्रवाद का नवसृजन कियाह भूले हुए अध्यात्मवाद को पुनर्जीवित किया और राजनीतिक देशभक्ति का परोक्ष रूप से मार्ग प्रशस्त किया।

” लेखकों के विचार में विवेकानंद व्यक्ति तथा राष्ट्र के मन से हीन भावना, भय, उदासीनता और जड़ता को निकाल फेंकना चाहते थे। आत्मा की अमरता का संदेश देकर विवेकानंद ने नौजवानों को निर्भीकता का पाठ पढ़ाया तथा उन्हें मानसिक रूप से देश के लिए प्राण उत्सर्ग हेतु प्रेरित किया। देश के जुझारू क्रांतिकारी, विवेकानंद की शिक्षा तथा संदेश से प्रेरित व प्रभावित थे।

प्र 18. ‘आर्य समाज ने एक पुनरुत्थानवादी आंदोलन को जन्म देकर इसे व्यापक बनाया, लेकिन इसके साथ ही साथ इसने अप्रत्यक्ष रूप से हिंदू कट्टरपंथिता एवं सांप्रदायिकता को भी बढ़ावा दिया।’ दयानंद सरस्वती के प्रयासों के आधार पर इस कथन की समीक्षा करें। (निबन्धात्मक)

उत्तर- आर्य समाज आंदोलन भारत में बढ़ते पाश्चात्य प्रभाव की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ। इसके संस्थापक दयानंद सरस्वती थे। उन्होंने वैदिक धर्म का प्रचार करते हुए धार्मिक आडंबर को दूर करने के लिए ‘पाखंड खंडिनी पताका’ फहराई तथा सत्यार्थ प्रकाश की रचना की। उन्होंने ‘वेदों की ओर लौटो’ का नारा देकर भारतीय जनमानस के मध्य वेदों की महत्ता स्थापित की।

स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक में अपने धार्मिक सिद्धांतों की व्याख्या की। वे वेदों की सर्वोच्चता, पुनर्जन्म और कर्म के सिद्धांत में विश्वास रखते थे। उनके अनुसार पुराण स्वार्थी, अज्ञानी और दुष्ट व्यक्तियों की रचनाएं हैं। उनकी धारणा थी कि संसार का समस्त ज्ञान वेदों में ही निहित है। इसलिए मनुष्य को वेदों की ओर लौटना चाहिए। उन्होंने हिंदू धर्म और समाज की बुराइयों की भी आलोचना की है।

वे बहुदेववाद एवं मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने धार्मिक कर्मकांडों तथा पुरोहिती आधिपत्य की भी आलोचना की। इसी प्रकार दयानंद सरस्वती ने हिंदू संस्कारों, तीर्थ यात्रा, यज्ञ, बलि, जाति प्रथा तथा बाल विवाह, पर्दा प्रथा की भी निंदा की। इसके विपरीत उन्होंने विदेश यात्रा, विधवा विवाह और नारी शिक्षा को अपना समर्थन दिया है।

वे पहले भारतीय सामाजिक- धार्मिक सुधारक थे जिन्होंने सभी शुद्रों और स्त्रियों को भी वेदों के अध्ययन एवं इसकी व्याख्या करने का अधिकार दिया। शुद्धि आंदोलन द्वारा धर्म परिवर्तन और अन्य व्यक्ति को हिंदू समाज में उन्हें वापस लेने की व्यवस्था थी।

सामाजिक क्षेत्र में आर्य समाज की सबसे बड़ी देन यह है कि इसने जाति व्यवस्था की संकीर्णता को दूर करने का प्रयास किया। शुद्धिकरण द्वारा धर्मान्तरित हिंदुओं को वापस हिंदू धर्म में लाकर उन्होंने हिंदू धर्म और समाज का एक अंग बनाया। उन्होंने हिंदू जाति के उत्थान एवं उसकी सुरक्षा के लिए इसे संगठित करने का प्रयास भी किया। शिक्षा के प्रसार हेतु डी ए वी कॉलेजों की स्थापना की गई।

पारंपरिक ज्ञान को प्रसारित करने हेतु गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना हुई। आर्य समाज विदेशी दासता को एक अभिशाप मानता था और स्वतंत्रता एवं लोकतंत्र का पक्षधर था। इसने राष्ट्रवाद को बढ़ावा देकर हिंदी भाषा और साहित्य का विकास किया। दयानंद सरस्वती का उद्घोष ‘हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान’ प्रबल राष्ट्रवाद का उदाहरण है।

दयानंद सरस्वती के उग्र राष्ट्रवाद ने कहीं ना कहीं अलीगढ़ मुस्लिम आंदोलन को तीव्रता प्रदान की क्योंकि इनके विचार मुख्यतः हिंदू धर्म से संबंधित विचारों को ही प्रश्रय प्रदान करते थे।

अल्पसंख्यक मुस्लिम को संगठित करने के लिए सर सैयद अहमद खां जैसे विचारकों ने प्रयास किए। धीमे-धीमे यह विचार इतने केंद्रित होते गए कि अंततः सांप्रदायिकता का विकास उत्तरोत्तर होता गया और आर्य समाज को मात्र हिंदू संगठन ही स्वीकार किया गया। इससे संबंधित राष्ट्रवादियों के समूह और आर्य समाज के उग्र राष्ट्रवाद के आधार पर इसे वेलेंटाइन शिरोल ने ‘भारतीय अशांति का जनक’ कहा है।

Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

P K Nagauri, महावीर जी कुमावत

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