

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (National movement of India) केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि UPSC और RAS (MPSC/UPPSC) जैसी शीर्ष सिविल सेवा परीक्षाओं के पाठ्यक्रम की रीढ़ है। प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) के बहुविकल्पीय प्रश्नों से लेकर मुख्य परीक्षा (Mains) के विश्लेषणात्मक उत्तरों तक, इस खंड से प्रतिवर्ष भारी संख्या में अंक तय होते हैं। यह विशेष पोस्ट टू-द-पॉइंट (To-the-point) एप्रोच और मुख्य परीक्षा की शब्द-सीमा (50-60 और 100-120 शब्द) को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। यदि आप प्रशासनिक सेवाओं में सफलता सुनिश्चित करना चाहते हैं, तो इन चुनिंदा व उच्च-गुणवत्ता वाले उत्तरों का अभ्यास आपकी तैयारी को धार देने और अधिकतम अंक बटोरने में मील का पत्थर साबित होगा। इसे अंत तक जरूर पढ़ें!
Advertisement

उत्तर- मार्च 1919 में ब्रिटिश सरकार द्वारा पारित यह एक दमनकारी कानून था, जिसका उद्देश्य भारत में उभर रहे राष्ट्रीय आंदोलन और क्रांतिकारी गतिविधियों को कुचलना था। इसके तहत सरकार को यह अधिकार प्राप्त था कि वह किसी भी संदिग्ध भारतीय को बिना मुकदमा चलाए और बिना जमानत के अनिश्चितकाल तक जेल में बंद रख सकती थी। इसे जनता ने "बिना अपील, बिना वकील, बिना दलील" का काला कानून कहा।
उत्तर- यह 1928 में गुजरात के किसानों द्वारा प्रांतीय सरकार द्वारा बढ़ाए गए 30% लगान के विरोध में चलाया गया एक अत्यंत संगठित और सफल किसान आंदोलन था। इसका कुशल नेतृत्व सरदार वल्लभभाई पटेल ने किया। आंदोलन की अभूतपूर्व सफलता और संगठित स्वरूप को देखते हुए वहाँ की महिलाओं ने पटेल को 'सरदार' की उपाधि प्रदान की थी।
उत्तर- द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीयों का सहयोग प्राप्त करने के लिए वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने 8 अगस्त 1940 को यह घोषणा की। इसके मुख्य प्रस्ताव थे— युद्ध के बाद भारत को 'डोमिनियन स्टेटस' (औपनिवेशिक स्वराज्य) देना, वायसराय की कार्यकारी परिषद का विस्तार करना, एक युद्ध सलाहकार समिति का गठन करना और युद्ध के बाद भारतीयों द्वारा स्वयं संविधान निर्माण हेतु एक निकाय स्थापित करना।
उत्तर- मार्गरेट नोबल आयरलैंड की एक शिक्षित महिला थीं, जो स्वामी विवेकानंद की शिष्या बनने के बाद भारत में 'सिस्टर निवेदिता' के नाम से प्रसिद्ध हुईं। वह भारतीय मठावासीय जीवन क्रम (Monastic Life) में प्रवेश करने वाली पश्चिमी देश की पहली महिला थीं। उन्होंने वेदांत दर्शन और हिंदू धर्म की व्याख्या एक प्रगतिशील 'राष्ट्रीय दर्शन' के रूप में की तथा भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को वैचारिक संबल प्रदान किया।
उत्तर- मैडम भीकाजी कामा एक पारसी क्रांतिकारी महिला थीं, जिन्होंने 1907 में स्टटगार्ट (जर्मनी) में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस में भारत का पहला राष्ट्रीय ध्वज फहराया था। उन्होंने पेरिस से 'वन्दे मातरम' और 'मदन तलवार' नामक क्रांतिकारी समाचार पत्रों का संपादन व प्रकाशन किया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके अप्रतिम योगदान के कारण उन्हें 'भारतीय क्रांतिकारियों की माता' (Mother of Indian Revolution) कहा जाता है।
उत्तर- यह 1904 में विनायक दामोदर सावरकर (वी.डी. सावरकर) और उनके भाई गणेश सावरकर द्वारा महाराष्ट्र में स्थापित एक गुप्त क्रांतिकारी संगठन था। इसकी शुरुआत 1899 में 'मित्र मेला' के रूप में हुई थी, जो बाद में 'अभिनव भारत' में परिवर्तित हुई। इसका मुख्य उद्देश्य सशस्त्र विद्रोह और क्रांतिकारी गतिविधियों के माध्यम से ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकना था।
उत्तर- वर्ष 1929 में सीमांत प्रांत में खान अब्दुल गफ्फार खान द्वारा गठित यह एक सशक्त अहिंसावादी और सुधारवादी संगठन था। इस संगठन के सदस्य लाल रंग के कुर्ते पहनते थे, जिसके कारण इन्हें 'लाल कुर्ती दल' भी कहा गया। यह संगठन पठानों में राष्ट्रीय चेतना जगाने, सामाजिक सुधार करने और मुस्लिम लीग की सांप्रदायिक व कट्टरवादी विचारधारा का विरोध करने के लिए समर्पित था।
उत्तर- सर विलियम जोन्स एक सुप्रसिद्ध अंग्रेज प्राच्यविद् (Orientalist) और न्यायविद थे, जिन्होंने 1784 में कोलकाता में 'एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल' की स्थापना की थी। उन्होंने प्राचीन भारतीय इतिहास, दर्शन, साहित्य और संस्कृति के वैज्ञानिक अध्ययन व अनुवाद (जैसे- अभिज्ञानशाकुंतलम) की नींव रखी, जिसने भारतीयों में अपनी गौरवशाली विरासत के प्रति स्वाभिमान और राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत किया।
उत्तर- नागालैंड की एक वीर नागा आध्यात्मिक व राजनीतिक नेता थीं, जिन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) के दौरान मात्र 13 वर्ष की आयु में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक सशक्त सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व किया। उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा आजीवन कारावास की सजा दी गई। स्वतंत्रता के पश्चात जेल से रिहा होने पर जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें 'रानी' की उपाधि से सम्मानित किया था।
उत्तर- 1927 में हरकोर्ट बटलर की अध्यक्षता में गठित बटलर समिति का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश 'सर्वोच्चता' (Paramountcy) तथा ब्रिटिश क्राउन और देशी रियासतों (Princely States) के बीच संबंधों की जांच करना और उन्हें परिभाषित करना था। 1929 में आई इसकी रिपोर्ट ने 'सर्वोच्चता' को जानबूझकर अपरिभाषित और लचीला रखा, जिसके कारण रियासतों के अधिकारों की अनदेखी हुई और इस रिपोर्ट की तीव्र आलोचना की गई।
उत्तर- बाल गंगाधर तिलक ने 'केसरी' (मराठी) और 'मराठा' (अंग्रेजी) समाचार पत्रों के माध्यम से जनता में राष्ट्रवाद का प्रसार किया। उन्होंने 1896 के अकाल के दौरान कर-बंदी आंदोलन चलाकर जनता को राजनीतिक रूप से जागरूक किया। वह प्रथम कांग्रेसी नेता थे जो राजनीतिक कारणों से कई बार जेल गए।
तिलक ने ही सर्वप्रथम "स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा" का सिंहनाद किया। उन्हीं के प्रयासों से 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में स्वशासन, बहिष्कार, स्वदेशी और राष्ट्रीय शिक्षा के प्रस्ताव पारित हुए। 1916 में 'होम रूल लीग' आंदोलन चलाकर उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन के सामाजिक आधार को व्यापक और जनाभिमुख बनाया।
उत्तर- एनी बेसेंट एक प्रख्यात आयरिश महिला थीं जो 1893 में थियोसोफिकल सोसाइटी के कार्य हेतु भारत आईं और बाद में इसकी अध्यक्ष बनीं। उन्होंने 1898 में वाराणसी में 'सेंट्रल हिंदू कॉलेज' की स्थापना की, जो बाद में BHU बना। 1914 में उन्होंने 'कॉमनवील' और 'न्यू इंडिया' पत्रों के माध्यम से स्वशासन के विचारों का प्रचार किया।
1916 में उन्होंने अखिल भारतीय 'होम रूल लीग' आंदोलन शुरू कर देश में राष्ट्रवाद की नई लहर पैदा की। वह 1917 के कलकत्ता अधिवेशन में कांग्रेस की 'प्रथम महिला अध्यक्ष' चुनी गईं। उन्होंने भारतीय जनमत को जाग्रत करने, बालचर संघ (Scouts) और भारतीय महिला संघ की स्थापना में ऐतिहासिक योगदान दिया।
उत्तर- गोपाल कृष्ण गोखले एक प्रमुख उदारवादी नेता और महादेव गोविंद रानाडे के शिष्य थे। वह ब्रिटिश न्यायप्रियता में विश्वास करते थे और प्रारंभिक दौर में ब्रिटिश राज को भारत के लिए आधुनिकता का एक माध्यम मानते थे, परंतु वे इसके अंधसमर्थक नहीं थे। उन्होंने ब्रिटिश शासन की औपनिवेशिक नीतियों पर गंभीर प्रहार किए:
प्रशासनिक आलोचना: उन्होंने ब्रिटिश शासन को 'सफेद नौकरशाही' कहा और जिला स्तर पर कलेक्टर की शक्तियों को नियंत्रित करने के लिए लोकप्रिय समितियों के गठन का सुझाव दिया।
नैतिक ह्रास का आरोप: गोखले के अनुसार ब्रिटिश राज का सबसे बड़ा पाप यह था कि इसने भारतीयों में हीनभावना भरकर उन्हें नैतिक दृष्टि से बौना (हीन) बना दिया।
आर्थिक दोहन की पोल: उन्होंने ब्रिटिश शासन को अत्यधिक खर्चीला बताया। 1897 में वेल्बी आयोग के समक्ष साक्ष्य देते हुए उन्होंने सिद्ध किया कि भारत की 75% जनता को दो वक्त की रोटी नसीब नहीं होती, जबकि ब्रिटिश अधिकारी भारी वेतन-भत्ते डकार रहे हैं।
कर्जन की तुलना: 1905 के बंगाल विभाजन से क्षुब्ध होकर उन्होंने वायसराय लॉर्ड कर्जन की तुलना क्रूर मुगल शासक औरंगजेब से की। उन्होंने स्वदेशी आंदोलन का पूर्ण समर्थन किया, हालांकि वे आर्थिक बहिष्कार को लेकर थोड़े संशय में थे।
उत्तर- उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) के महान नेता खान अब्दुल गफ्फार खान को 'सीमांत गांधी' या 'बादशाह खान' के नाम से जाना जाता है। उन्होंने रोलेट एक्ट के विरोध और खिलाफत आंदोलन से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। 1930 से 1947 के बीच कांग्रेस के सभी प्रमुख आंदोलनों में उनकी सक्रिय भूमिका रही।
1929 में उन्होंने 'खुदाई खिदमतगार' (ईश्वर के सेवक) नामक संगठन की स्थापना की, जिसने पठानों में राष्ट्रवाद, अहिंसा और सामाजिक सुधारों की अलख जगाई। वे धर्मनिरपेक्षता के प्रति पूर्णतः कटिबद्ध थे और मुस्लिम लीग की सांप्रदायिक व विभाजनकारी द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की विचारधारा के कट्टर विरोधी थे।
विभाजन के बाद भी उन्होंने पख्तूनों के अधिकारों के लिए 'पख्तूनिस्तान' आंदोलन चलाया, जिसके कारण उन्हें पाकिस्तानी जेलों में लंबा समय बिताना पड़ा। राष्ट्र के प्रति उनकी निःस्वार्थ सेवा के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1987 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से विभूषित किया।
उत्तर- 'डिकी बर्ड प्लान' (जिसे लॉर्ड माउंटबेटन के उपनाम पर रखा गया था) भारत के विभाजन और सत्ता हस्तांतरण के लिए तैयार की गई एक प्रारंभिक गुप्त योजना थी। 1946 के अंत तक यह स्पष्ट हो चुका था कि भारत का विभाजन अपरिहार्य है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य 'डोमिनियन स्टेटस' के आधार पर त्वरित सत्ता हस्तांतरण करना था ताकि नए संविधान के पूरी तरह बनने तक प्रतीक्षा न करनी पड़े। इसके मुख्य प्रावधान निम्नलिखित थे:
प्रांतीय स्वायत्तता और विभाजन: प्रांतों को यह विकल्प दिया गया कि वे चाहें तो अपनी अलग संप्रभुता चुन सकते हैं।
बंगाल और पंजाब: इन प्रांतों की विधानसभाओं के हिंदू और मुस्लिम बहुसंख्यक जिलों के सदस्यों की अलग-अलग बैठकें बुलाई जाएं। यदि कोई भी पक्ष विभाजन चाहेगा, तो प्रांत का विभाजन कर दिया जाएगा।
जनमत संग्रह व विलय: पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत और असम के सिलहट जिले में जनमत संग्रह कराने तथा सिंध को वोट द्वारा निर्णय लेने का अधिकार दिया गया। साथ ही, हैदराबाद के पाकिस्तान में विलय की संभावना को पूरी तरह खारिज कर दिया गया। नेहरू द्वारा तीव्र विरोध किए जाने के बाद इस योजना को वापस ले लिया गया और इसके स्थान पर '3 जून योजना' लाई गई।
उत्तर- वर्ष 1905 में लॉर्ड कर्जन द्वारा किए गए बंगाल विभाजन के विरोध में 'स्वदेशी आंदोलन' का उदय हुआ। यह भारत का पहला आधुनिक जन-आंदोलन था, जिसने राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिशा दी। इस आंदोलन का मुख्य नारा 'विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार' और 'स्वदेशी का अपनाना' था, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्यवाद पर आर्थिक चोट करना था। बाद में यह आंदोलन राजनीतिक असहयोग में बदल गया।
इस आंदोलन की मुख्य विशेषता समाज के सभी वर्गों, विशेषकर छात्रों और महिलाओं की अभूतपूर्व भागीदारी थी। जनचेतना के प्रसार में बरीसाल के समाचार पत्र 'हितैषी' और कोलकाता के 'संजीवनी' ने क्रांतिकारी भूमिका निभाई। विदेशी वस्तुओं का उपयोग करने वालों का सामाजिक बहिष्कार किया जाने लगा।
1905 के बनारस अधिवेशन में कांग्रेस ने भी इस आंदोलन को अपनी औपचारिक स्वीकृति दी। रवींद्रनाथ टैगोर (जिन्होंने 'अमार सोनार बांग्ला' लिखा), विपिनचंद्र पाल और अरविंद घोष जैसे नेताओं ने आत्मनिर्भरता, राष्ट्रीय शिक्षा और सांस्कृतिक पुनर्जागरण को बढ़ावा देकर इस आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाया।
उत्तर- जयप्रकाश नारायण भारत के एक महान समाजवादी नेता और विचारक थे, जिन पर मार्क्सवाद और गांधीवाद का गहरा प्रभाव था।
स्वतंत्रता पूर्व योगदान: 1933 में उन्होंने नासिक जेल में अशोक मेहता और मीनू मसानी के साथ मिलकर 'कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी' (CSP) की नींव रखी। 1934 में पटना में इसके अधिवेशन की अध्यक्षता आचार्य नरेंद्र देव ने की। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने "ना एक पाई, ना एक भाई" का नारा देकर ब्रिटिश युद्ध प्रयासों का विरोध किया। 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान हजारीबाग जेल से भागकर उन्होंने 'आजाद दस्ता' का गठन किया और भूमिगत होकर आंदोलन को अभूतपूर्व गति प्रदान की। वे देश के विभाजन के सख्त विरोधी थे।
स्वतंत्रता पश्चात योगदान: आजादी के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर विनोबा भावे के 'भूदान आंदोलन' में भाग लिया और 'जीवनदानी' कहलाए। उन्होंने एक नवीन राजनीतिक दर्शन 'दलविहीन लोकतंत्र' (Partyless Democracy) का प्रतिपादन किया, जिसमें सत्ता के विकेंद्रीकरण और ग्राम पंचायतों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई थी।
1974 में उन्होंने बिहार से भ्रष्टाचार और कुशासन के विरुद्ध ऐतिहासिक जन-आंदोलन का नेतृत्व किया और 'सम्पूर्ण क्रांति' (जिसमें राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक— ये 7 क्षेत्र शामिल थे) का आह्वान किया। जून 1975 में आपातकाल लागू होने पर उन्हें जेल भेज दिया गया। 1977 में जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने विभिन्न विपक्षी दलों को मिलाकर 'जनता पार्टी' का गठन किया, जिसने केंद्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनाई। उन्हें भारत में 'लोकनायक' और जनता क्रांति का वास्तविक जनक माना जाता है।
उत्तर- द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति और वैश्विक दबाव के बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने भारत की राजनीतिक गुत्थी सुलझाने के लिए 19 फरवरी 1946 को तीन सदस्यीय 'कैबिनेट मिशन' (पैथिक लॉरेंस, स्टैफोर्ड क्रिप्स, ए.वी. अलेक्जेंडर) भेजने की घोषणा की। 24 मार्च 1946 को दिल्ली पहुँचे इस मिशन ने 16 मई 1946 को अपनी योजना प्रस्तुत की।
प्रमुख प्रावधान:
ब्रिटिश भारत और देशी रियासतों को मिलाकर एक 'भारतीय संघ' का गठन किया जाए, जिसके अधीन रक्षा, विदेशी मामले और संचार व्यवस्था होगी।
प्रांतों को तीन समूहों— क (हिंदू बहुसंख्यक), ख (मुस्लिम बहुसंख्यक उत्तर-पश्चिम) और ग (मुस्लिम बहुसंख्यक उत्तर-पूर्व) में वर्गीकृत किया गया।
एक 'संविधान सभा' का गठन होगा जिसके 389 सदस्यों का चुनाव प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से होगा।
पूर्ण संप्रभु पाकिस्तान की मांग को अव्यावहारिक मानकर खारिज कर दिया गया और एक अंतरिम सरकार के गठन का प्रस्ताव रखा गया।
प्रतिक्रिया:
प्रारंभ में मुस्लिम लीग ने 6 जून और कांग्रेस ने 25 जून 1946 को इस योजना को स्वीकार कर लिया। लीग पाकिस्तान की मांग खारिज होने से असंतुष्ट थी, लेकिन प्रांतों के अनिवार्य समूहीकरण (Compulsory Grouping) में उसे पाकिस्तान के बीज दिखाई दिए। वहीं कांग्रेस प्रांतों के इस समूहीकरण को ऐच्छिक (Optional) मान रही थी। इस वैचारिक मतभेद और अंतरिम सरकार में सीटों के विवाद के कारण अंततः मुस्लिम लीग इस योजना से अलग हो गई और 16 अगस्त 1946 को 'प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस' (Direct Action Day) की घोषणा कर दी, जिससे देश में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे।
विशेष आभार (Special Thanks): इस प्रश्नोत्तरी/सामग्री को तैयार करने में अपना अमूल्य योगदान देने वाले सम्मानित लेखकगण — श्री पी. के. नागौरी, श्री महावीर जी कुमावत, एवं श्रीमती रजनी जी तनेजा का हम सहृदय धन्यवाद करते हैं।
कैसी लगी आपको यह 'भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन' की स्पेशल पोस्ट? अपने विचार और सुझाव कमेंट सेक्शन में जरूर शेयर करें! अगर यह प्रयास आपकी तैयारी में मददगार लगा हो, तो इसे अपने साथी एस्पिरेंट्स और फैमिली के साथ शेयर करना न भूलें। अपनी निरंतरता बनाए रखें, सफलता निश्चित मिलेगी। और अधिक बेहतरीन क्विज़ के लिए अभी 9015746713 पर WhatsApp करें! All the best!
Advertisement